Monday, February 2, 2015

ललनवाँ का भाग' तो जग गया प्रधानमंत्रीजी! पर 'भवनवाँ का भाग' कब जागेगा?



 'ललनवाँ का भाग' तो उसी दिन जग गया था, प्रधानमंत्रीजी! जिसदिन आप उसी पार्टी के कंधे पर सवार होकर 'लालन कॉलेज' से सीधे लालकिले तक पहुँच गए, जिसको खड़ा करने में आपका कोई हाथ नहीं रहा. न घर में आपसे पूछने को कोई है और ना ही संसद में. 26  जनवरी के सरकारी विज्ञापनों में 'धर्मनिरपेक्षता' और 'समाजवाद' गायब कर दिए गए और विपक्ष में बैठी सबसे पुरानी पार्टी समेत पूरे विपक्ष ने इस पर चूं  तक नहीं किया, इतना खंडित विपक्ष तो नसीब वालों को ही मिलता है. जनता के खून-पसीने की कमाई पर ब्राजील, भूटान, ऑस्ट्रेलिया, नेपाल, जापान और यहां तक कि आपके लिए प्रतिबंधित, सपनों के देश अमेरिका की आपकी शाही यात्रा…… पाजामा-कुर्ता-बंडी से सीधे हजारों-लाखों के महंगे डिजायनर ड्रेस.... 
पेरिस में सिलते पं. नेहरू के ड्रेस से लेकर आज के डिजायनर ड्रेस की निरर्थक बहसों में उलझता या उलझा दिया जाता भय और भूख से विकल जनसामान्य सुनहरे दिन के दिवास्वप्न में लीन है. 
आजादी के बाद से ही एक वंशीय वटवृक्ष के नीचे करोड़ों भारतवासी लोकतंत्र की हरियाली की आस लगाए बैठे हैं. 14-16 घंटे की कमरतोड़ मेहनत भी दो वक़्त की रोटी जुटाने में कई बार कम पड़ जाती है. दो घूंट पानी के लिए तो घरों की महिलाएं मीलों जाती हैं. ना तो दो जून भरपेट खाना, ना तन पर पूरे कपडे और ना ही सिर पर छत.....  रोटी-पानी की कभी ना ख़त्म होने वाली तलाश में जूझते निम्नवर्ग के बच्चों की पहुँच से पाठ्यपुस्तकें दूर हो रहीं हैं, स्कूल-ड्रेस और बेतहाशा बढ़ते फीस शिक्षा-गिद्धों के लिए हथियार तथा अंतिम पायदान के लिए अभिशाप बनते जा रहे हैं. उनकी बदनसीबी के जख्मों पर आपके 'रीड इंडिया' जैसे शब्दकोषीय नारे नमक-मिर्च तरह काम करते हैं. क्या आप यह समझ पाते हैं?
देश धनकुबेरों की चारागाह बनता जा रहा है. हृदयहीन विकास का अर्थशास्त्र देश को बाजार नहीं बाजारू बनाने पर तुला है..... बहुत हुआ, अब काम कब होगा, करोड़ों  को सम्मानपूर्ण आजीविका कब देंगे…  प्रधानमंत्रीजी,  'भवनवाँ का भाग' कब जागेगा? 

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