Thursday, August 15, 2013

... और यह जीवन समर्पित


दो देश थे...पुष्पावर्त और पाषाणावर्त। एक बार पाषाणावर्त के राजा महोदर राजकीय निमंत्रण पर पुष्पावर्त आए। पुष्पावर्त के राजा महीपाल ने उनका पुरजोर स्वागत किया, पर स्वागत में न सेना दिखी, न ही कोई शासकीय ऐश्वर्य। होदर ने हँसकर कहा, क्या बात है, आपके यहाँ सेना नहीं है क्या?” महीपाल ने कहा कि हमारे यहाँ सैन्य-छावनी नहीं है। होदर ने आश्चर्य प्रगट करते हुए पूछा, “तब आप राजकोष की सुरक्षा कैसे करते हैं। महीपाल ने बताया कि उनके यहाँ राजकोष जैसी व्यवस्था नहीं है। यह सुनते ही होदर ने खिल्ली उड़ाने के भाव में कहा, “तब तो मैं बड़ी आसानी से पुष्पावर्त पर कब्जा कर सकता हूँ या मनचाही कीमत देकर यहाँ की जनता को खरीद सकता हूँ
महीपाल ने हँसकर टाल दिया। शाम को दोनों राज्य-भ्रमण पर निकले। राजकिले से बाहर निकलते ही होदर आश्चर्य से चिल्ला उठा..अरे यह क्या? दरअसल सामने पूर्ण अनुशासित, शस्त्रसज्जित व्यूहबद्ध सेना मानों आदेश की प्रतीक्षा में खड़ी थी तथा एक तरफ खाली स्थान में अकूत धन-सम्पदा रखी थी।
आश्चर्यचकितहोदर को इंगित कर महीपाल ने कहा, “हमने आज आपकी बात सुनकर मुनादी करवाई थी कि देश को प्राण न्योछावर करनेवाले सपूतों की आवश्यकता है ताकि ताकत के नशे में चूर कोई देश इसपर आक्रमण करने का साहस न कर सके तथा कोष की आवश्यकता है ताकि कोई धनोन्मत्त देश इसकी जनता को बिकाऊ न समझ सके। परिणाम आपके सामने है। यह देश अपने सशक्त समृद्ध राष्ट्रभक्त नागरिकों के द्वारा पूर्ण सुरक्षित और समृद्ध है...आप क्या कहते हैं?”
होदर लज्जित भाव से कभी महीपाल को, कभी सामने के दृष्य को देखता खड़ा रह गया....
 
क्या हमारा देश पुष्पावर्त नहीं बन सकता......