Saturday, April 16, 2011

अब बस भी कीजिए अन्ना

अब बस भी कीजिए अन्ना...

कबतक सुनेंगे और देखेंगे.. किनके लिए लड़ेंगे... हम बेशर्म हैं अन्ना... जब हम गोलगप्पे के पानी में मूत्र मिलाकर बेचने में नहीं शर्माते, दूध में सिंथेटिक मिलाकर उसे बेचने में हमारे हाथ नहीं कांपते, स्कूली बच्चों को खानें में जहर देने से नहीं हिचकते, किडनी बेचकर परिवार पालते हैं, बेटियों को गर्भ में ही मार देते हैं, बिना कंकड़ मिलाए दाल-चावल नहीं बेचते, फलों-सब्जियों में बिना इंजेक्शन दिए मन कांपता है तो आप ही बताएं अन्ना! कि हम अपना प्रतिनिधि देवलोक से तो नहीं लाएंगे न?

जरा सोचिए और बुरा मत मानिएगा अन्ना---- यदि नवाब ने उन्हे छोड़कर किसी दूसरी खूबसूरत बला के साथ अय्याशी करनी शुरू कर दी होती तो उनका शर्म गायब हो जाता। पर आज जब बेटा ब्याहता दुल्हन और बेटे को छोड़कर अय्याशी कर रहा है तो इसे नवाबों का मिजाज समझकर मस्त होने वाली शर्मीला जी भी आपको ब्लैकमेलर कह रही हैं... तो क्या बुरा कर रही हैं... प्रजातंत्र है सबलोग यहां कुछ ज्यादा ही स्वतंत्र हैं।

अन्ना! साइमन कमीशन और रॉलैट एक्ट गोरे अंग्रेजों का था। विरोध चल निकला था... जमाना आज काले अंग्रेजों का है। लोग आचार्य रामदेव को राजनीति की बात नहीं करने देंगे पर नाचने गाने वाले, शर्म लाज बेचकर आपको ब्लैकमेलर कहें तो लोग तालियां ही बजाएंगे... समझ रहे हैं न अन्ना...

अब बस कीजिए.. बस भी कीजिए....

Sunday, April 10, 2011

कांग्रेसी भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार न भवति।

'जमुरे'

'जी उस्ताद'

खेल दिखाएगा?

दिखाएगा...

जो पूछूं बताएगा?

बताएगा...

तो बता, यह जंतर मंतर पर कैसी भीड़ उमड़ी है?

उस्ताद... यह विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र के महानतम् मंत्रियों के परिषद से सजी स्वंयप्रभु भारत सरकार के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंकने वाले अत्यंत तुच्छ लोग हैं।
इनको क्या देखना? तमाशायी भीड़ को कोई अन्य खेल दिखाइए ना...

'जमुरे'

'जी उस्ताद'

मीडिया वाले तो भगवान सचिन और उनके विश्व विजय के सपने को पूरा करने वाले धोनी की धुरंधर सेना को ले उड़े, हमारी टीआरपी गिर गई है इसलिए दूसरे खेलों को छोड़.... जंतर-मंतर पकड़।

जी उस्ताद

तो बता... 'जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिए'-- गाने वाले लोग जंतर-मंतर पर किस तंतर( तंत्र) की उपज हैं।

उस्ताद... फंसे टेप की तरह क्यों एक ही राग अलाप रहे हो? ये सब फालतु का ड्रामा है। दूसरे के ड्रामे में पड़ोगे तो कॉपी राइट का मामला बन जाएगा या फिर 'तुम्हारे पास सीआईडी है तो हमारे पास सीबीआई है' वालों के हत्थे चढ़ जाओगे।
जमुरे... सीबीआई तो अभी मीडिया द्वारा प्रायोजित मर्डर मिस्ट्रीज़ सुलझाने व ( कांग्रेस) जनविरोधियों के पर कतरने में उलझी हुई है। हमारी ओर किसी का ध्यान नहीं है। तू जल्दी जंतर का मंतर सुलझा।
ठीक है उस्ताद, तो सुनिए जाके गुण 'सहस सारदा सेष' भी वर्णन करने में असमर्थ हैं उन सर्वाधिक ईमानदार और महानतम अर्थशास्त्री की क्षमता और आस्था केंद्र पर कीचड़ उछालने को इकट्ठी हुई यह भीड़ उन तुच्छ लोगों की है, जिन्हे मानस में 'भूमि परा कर गहत अकासा'(जमीन पर रहते हुए आकाश पकड़ने की कोशिश करने वाले) की श्रेणी में पहले ही डाला जा चुका है।

ठहर जमुरे, अपने तमाशाइयों को पारिभाषिक शब्दावली में मत उलझा। पहले यह क्लीयर कर कि सर्वाधिक ईमानदार और महानतम अर्थशास्त्री की डिग्री कैसे बांटी तूने।

उस्ताद... एक सौ बीस करोड़ बेइमानों से भरे भारतवर्ष में सात वर्षों से कुर्सी के असली वारिसों के इशारे पर प्रधानमंत्री रहते हुए जिसके दिल में 'अमानत में खयानत' का ख्याल भी न आया हो, जो सपने में भी कुर्सी 'राव' या सत्ता 'केसरी' की कौन कहे... छोटे प्रांतों में 'उमा' का 'बाबूलाल' बनने का विजातीय विचार तक नहीं लाया हो... ऐसा महान व्यक्ति ईमानदारी की प्रतिमूर्ति ही तो है।
और वह महान अर्थशास्त्री वाली....

उस्ताद.... (कांग्रेस) जनविरोधी पार्टियां 'महंगाई-महंगाई' के घड़ियाली आंसू बहा रही थी, मीडिया 'महंगाई डायन खाये जात है' का बेसुरा राग गाने लगा था। लोग एक पूरे वर्ष में मात्र दो गुणें हुए दामों के नाम पर बर्गलाए जा रहे थे और -कोउ नृप होउ हमे का हानी, चेरी छोड़ न होखब रानी- के सूत्र वाक्य से लोगों का मोह टूटने ही वाला था कि अंधकार में 'मुहूर्तम् ज्वलितोश्रेयः' की तर्ज पर इन्होने ही चट्ट से लालबुझकड़ी रहस्योद्घाटन कर दिया था-' यह तो भारत के महान लोग हैं जिनके पास पैसा अधिक है और अधिक खर्च करने की औकात है- वर्ना जमाखोरों कालाबाजरियों या विधायकों, सांसदों या चोर मंत्रीमंडल की क्या औकात जो महंगाई बढ़ा दे। यह कौटिल्य( कुटिलता से जन्मा) अर्थ सूत्र भविष्य का सर्वाधिक चर्चित अर्थ सूत्र माना जाएगा।
ओह तो इसी एक सूत्र ने इन्हे महान अर्थशास्त्री...

अरे नहीं उस्ताद, यह तो बाहरी लौकिक कारण है। अंदर की बात यह है कि यह ही वह महान विभूति हैं जो महान वंश के गुढ़ संकेतो ंका अर्थ- निष्पादन कर सकते हैं।

अर्थात्

देखो उस्ताद...
जो तनिक हवा से बाग हिली।
लेकर सवार उड़ जाता था।।
राणा की पुतली फिरी नहीं।
तबतक चेतक मुड़ जाता था।।
वाले चेतक के समान यह 'सिंह' भी 'सिंहवाहिनी' के मनोभावों को पहले ही भांप जाता है और अरिमस्तक भंजन करने लग जाता है।
अबे थोड़ा क्लीयर तो कर...

उस्ताद... हंगामें की शुरूआत की रात टीवी चैनलों पर जो अचानक 'मनु'स्मृति गुंजने लगी थी कि- अन्ना को बहकाकर उन्हे भूखा मारने वाले आसपास के लोग परिणाम के जिम्मेवार होंगे ( न कि हम भ्रष्ट सरकारी नुमाइंदे या बेशर्म राजनेतागण) और दूसरे दिन टीवी पर महान वंश की विरुदावली गान में निपुण भाट-चारणी परंपरा के नवीन संस्करण 'तिवारी बाबा' ने इसे जो प्री-मैच्योर कहा था और इसके पीछे जो केसरिया षडयंत्र खोजा था वह इन्ही का अर्थ कौशल है... यह महान हैं क्योंकि बोलते नहीं- बोलने के लिए वक्ता- प्रवक्ता रख छोड़े हैं- जो संकटों के समय चिल्लाकर 'जन' को सतर्क और बहुजन को डराने में लग जाते हैं....... यह महान हैं- क्योंकि यह परिणाम का श्रेय स्वंय नहीं लेते बल्कि पात्रतानुसार किसी को 'अशोक', किसी को 'कल'माड़ी तो किसी को 'राजा' बनाकर नाप देते हैं। यह महान हैं क्योंकि सिंहासन की चरणपादुका बने रहते हैं और कोश को भरने और सुरक्षित करने के सारे अर्थ सूत्रों के अकेले व्याख्याता हैं। ... यह महान हैं क्योंकि भृकुटी तो बाद में टेढ़ी होती दिखती है, यह पहले ही भांपकर उच्चतम न्यायालय तक को 'अनु'शासन में रहने का निर्देश दे देते हैं। ----- बच्चन परिवार, आईपीएल मोदी जैसे सुरमा इसे पहले ही समझ चके थे और अभी-अभी अरुणाचल में बाबा रामदेव को समझा दिया गया है।
भुज बिक्रम जानहि दिगपाला।
सठ अजहु जिनके उरसाला।।
और तो और जिस प्रकार नारद के कृष्ण भोगों में लिप्त दिखते हुए भी योगेश्वर हैं, दुर्वासा फल, मिठाइयों का भोग लगाते हुए भी भोजन त्यागी हैं उसी प्रकार' वंश- दर-वंश कुर्सी पकड़' वाला यह तंत्र राजतंत्र दिखता हुआ भी प्रजातंत्र है... यह अर्थ निष्पादन इन्हीं महान अर्थशास्त्री का कौशल है।

अब समझा। लेकिन यह भ्रष्टाचार का शोर कैसा?

उस्ताद.... भ्रष्टाचार सापेक्ष शब्द है। जैसे ' वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति' वैसे ही ' कांग्रेसी भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार न भवति' फिर चाहे कोई पटना में गांधी मैदान बेच दे, कॉमनवेल्थ को पर्सनल बना ले अथवा मुंबई में 'आदर्श' स्थापित कर ले । यहां तक कि
कोटि विप्र बध लागहीं जाहू,
आये सरन तजउं नहीं ताहू - की मर्यादा का पालन भी किया है। झारखंड पर मधु का कोड़ा - मधु पर कोड़ा नहीं ही बना। चारा चट्ट को ललू बनाने की सारी मुहिम धरी की धरी रह गई थी और जब जब भक्तन पर भीर पड़ती है तब तब ' यथा नियुक्तोस्मि तथा करोमि' के 'अर्जुन' की तरह एंडरसन- दुखभंजन का निमित बन जाते हैं।

जमुरे ...

जी उस्ताद

इस जंतर मंतर पर हो रहे हुड़दंग के समय वह ( कांग्रेस) जन-मन- व्यापिनी शक्ति कहां कौंध रही है।

उस्ताद, 'क्वात्रोची- तारिणी' सबमें व्याप्त वह महाशक्ति चुनावी रणघोष कर रही हैं।.....
मम भुज सागर बल जल पुरा।
जंह बूड़े बहु सुर नर सुरा।।
दिगपालन में नीर भरावा।
भूप सुजस खल मोहि सुनावा।।

और इन सब का परिणाम

उस्ताद अभी तक नहीं समझे

---- ?

एक और दशहरा