Saturday, August 20, 2011

मैं अन्ना हजारे क्यों हूँ


16 अगस्त 2011 को अन्ना के अनशन शुरू करते ही कांग्रेसी खेमा किस कदर बौखलाया हुआ है, यह उसके औपचारिक प्रवक्ताओं और अनौपचारिक लिक्खाड़ों की भाव-भंगिमा और भाषा से साफ झलक रहा है। कांग्रेसी प्रवक्ता प्रेस-कांफ्रेंस करता है और खारिज हो चुके आयोग की रपट दिखाकर फिल्मी गली के गुण्डों की तरह चीखता है,-बाबू किशनराव हजारे उर्फ अन्ना, तुम किस मुँह से भ्रष्टाचार की विरोध की बात करते हो, जबकि तुम खुद सिर से पाँव तक भ्रष्टाचार में लिप्त हो। वह सत्ता के नशे में या चाटुकारिता के अतिरेक में (जिसके दम पर वह इतने कम समय में इतनी बड़ी राजनैतिक पार्टी का प्रवक्ता बन बैठा है) यह भूल जाता है कि उसकी पिता की उम्र के निष्कलंक अन्ना आज सम्पूर्ण देश के आदर्श हैं। एक अन्य प्रवक्ता अमेरिका पर ओसामाजी (?) की नृशंस हत्या (?) से इस कदर बौखलाया हुआ है कि इस सरकार की सर्वओर विफलता से उठे जनाक्रोश की आँधी में अमेरिका का हाथ देखने लगता है। धर्म-जाति-भाषा-प्रान्त के आग्रहों से ऊपर उठकर गाँव की गलियों और शहरों की परिधि से निकलकर आकाश भेदते भारत माता का जयघोष करती जनता का आदर्श पुरुष इन्हें कभी साम्प्रदायिक ताकतों का मुखौटा लगता है तो कभी अमेरिका का मुहरा। और मजे की बात तो यह है कि बावजूद सारे विरोधों के, देश की सम्प्रभुता की कीमत पर इसी अमेरिका से एटमी-सन्धि के समर्थन के लिए तीन दुर्दान्त सजायाफ्ता सांसदों को संसद में बैठने की अनुमति दे दी गई थी। जनता के मताधिकार का इससे बड़ा उपहास क्या हो सकता है ?

इसी लहजे में एक दैनिक समाचार पत्र के एडीटर एट लार्ज ने अचानक अकुलाकर एक लेख अपने अखबार में लिख मारा है— मैं अन्ना हजारे क्यों नहीं हूँ। उच्च पदासीन एडीटर एट लार्ज को अन्ना का आन्दोलन केवल मध्य वर्ग का पाखण्ड नजर आता है , जो उनके अनुसार भ्रष्टाचार से ज्यादा कई गम्भीर मुद्दों पर कभी सामने नहीं आता। वह कहते हैं कि, मैं आपको यह बता दूं कि मैं गांधी टोपी लगाकर, मोमबत्ती जलाकर आजादी के दूसरे आंदोलन में शामिल नहीं होने जा रहा। मैं आपको बताना चाहता हूँ कि मैं अन्ना हजारे क्यों नहीं बनना चाहता। यह विरोध आंदोलन है, कोई क्रांति नहीं। मुझे इसकी भावनाओं में मध्य वर्ग का एक पाखंड दिखाई देता है।

श्री समर हलर्नकर स्वज्ञानातिरेक में शायद यह भूल गए कि भारत की आजादी की लड़ाई में वह मध्य वर्ग का भावुक जनमानस ही था जिसने ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज अस्त कर दिया था। रॉलेट ऐक्ट और साइमन कमीशन के विरोध का आन्दोलन ही स्वराज्य-क्रान्ति की आधार-भूमि थी। फाँसी के फन्दों की ओर बढ़ते भावुक बिस्मिल हों, भगत सिंह हों अथवा अशफाक हों— भावुक मन का समवेत उभार ही क्रान्ति का जनक होता है। वैसे भी तथाकथित सर्वज्ञानियों की तरह ही उत्साह के अतिरेक में श्री हलर्नकर यह देखने का कष्ट भी नहीं करते कि वनाञ्चलों से भी वही जनघोष सुनायी पड़ रहा है, जो मेट्रोपोलिटन शहरों से। मध्यप्रदेश में बैतूल जिला मुख्यालय से पचास कि.मी. दूर अमर शहीद विष्णुसिंह गौड़ की धरती के वनवासी श्री बलवन्त परते के साथ रणघोष कर रहे हैं- हम संकल्प लेते हैं कि हम न तो रिश्वत लेंगे, न ही रिश्वत देंगे। श्री हलर्नकर, क्या अन्ना के सत्याग्रह का यह दिव्य प्रभाव भी आपकी समझ(?) में भावना का पाखण्ड है?

आप गाँधी टोपी लगाकर, आजादी के दूसरे आंदोलन में शामिल नहीं होने जा रहे, जा भी नहीं सकते। आपसे पहले भी इस आन्दोलन से जुड़ने के एक मान्य न्यायाधीश के आग्रह का देश के एक सांसद ने वंशतन्त्र के सम्पूर्ण अहंकार से उत्तर दिया था, मुझे नेता बनने का कोई शौक नहीं है। और इस शालीनता(?) पर सम्पूर्ण कांग्रेसी कुनबा मुग्ध हो उठा था। जिन कांग्रेसियों को अपनी नौकरियों से एक दिन का अवकाश लेकर आन्दोलन से जुड़ने का अन्ना का आह्वान कानून और संविधान के लिये घातक दिख रहा था, वही गदगदाया कुनबा किसानों की राख से भट्टा-पारसौल पट गया है, औरतों से बलात्कार हुआ है की झूठी अफवाहें फैलाकर कार्यपालिका के साथ ही न्यायपालिका को भ्रमित करने की चेष्टा करते सांसद की घृणित और दण्डनीय हरकत को बाललीला समझ पुलकित हो रहा था। यूपी में पुलिस बर्बरता देख अपने को भारतीय कहने में शर्माने वाले स्वयंभू कर्णधार दिल्ली में आधी रात के बाद पुलिस की रावणलीला पर चुप रहें तो देश मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना, अब तो सारा देश है अन्ना की ताल पर थिरकेगा ही। जब देश यह देखेगा कि भोपाल के भीषण नरसंहार का अपराधी आसानी से देश से चला जाता है और विदेश मन्त्रालय सम्हालते तत्कालीन प्रधानमन्त्री और उनके वारिस सफाई से अपना पल्ला झाड़ लेते हैं या जब किसी क्वात्रोची की रक्षा को कोई अदृष्य हाथ अचानक सीबीआई पर अंकुश बन जाता है और हम क्या करें कि मासूमियत(?) फिजा में तैर जाती है तब जनलोकपाल के रूप में एक और निष्पक्ष तथा स्वतन्त्र लोकतान्त्रिक स्तम्भ की माँग उठेगी ही। जब कुर्सी के खेल में सत्ता के दलाल सूटकेसों में नोट भरकर सांसदों को खरीद लेते हैं, जब देश के प्रधानमन्त्री हर घोटाले के पकड़े जाने पर झूठी मासूमियत का लबादा ओढ़े मेरी जानकारी में नहीं था, यह गठबन्धन धर्म की मजबूरी थी, गठबन्धन के अन्य घटकों की जवाबदेही मुझपर नहीं है, मेरे पास जादू की छड़ी नहीं है जैसे अनर्गल प्रलाप कर रहे हों तब देश की जनता प्रधानमन्त्री को स्वतन्त्र लोकपाल के दायरे में देखना चाहेगी ही।

बिहार में पशुओं तक का चारा चट्ट कर जाने वाले, लोकशाही की गलत व्याख्या कर केन्द्र की शह पर झारखण्ड की आनेवाली सात पीढ़ियों तक का खुराक हजम कर जाने वाले, महाराष्ट्र में आदर्श स्थापित करने वाले, टूजी, कॉमनवेल्थ जैसे घोटालों के सहारे जनता की गाढ़ी कमाई लूट लेने वाले माननीय(?) वर्तमान व्यवस्था की खामियों का चतुराई से फायदा उठा लेते हों या हत्या, बलात्कार, अपहरण, सांप्रदायिक दंगों जैसे घृणित अपराधों में लिप्त लोग व्यवस्था का फायदा उठा संसद / विधानसभाओं में पहुँचकर शासक बन जा रहे हों और वर्तमान व्यवस्था इन्हें रोक नहीं पा रही हो तो व्यवस्था-परिवर्तन की माँग उठेगी ही।

तथाकथित आर्थिक विकास के नाम पर अपने घरों से विस्थापित आश्रयहीन देशवासी दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। उनके पुनर्वास के नाम पर सत्ताधारियों द्वारा जनता की सम्पत्ति का बन्दरबाँट अथवा विरोधी सरकार को घेरना सांसदों / विधायकों का पसंदीदा काम है। जनहित के मामलों को संसद में उठाने के लिए रूपये लेना, एक-दूसरों को नीचा दिखाने के लिए संसद को ठप्प कर देना, सत्र में सोना या अनुपस्थित रहना अथवा गाली-गलौज से जूतम-पैजार तक के लिए आमादा रहना और इन सबके बीच यह भूल जाना कि आप जनता के प्रतिनिधि हो— ऐसे अपराधों को रोकने, इनकी जाँच करने और अपराध सिद्ध होने पर इसके लिए इन्हें कठोरतम दण्ड देने की अनुशंसा करने के लिए क्या कोई स्वतन्त्र लोकतान्त्रिक संस्थान नहीं होना चाहिये? क्योंकि एक तो अबतक की व्यवस्था में कई छिद्र हैं जिनके कारण आज तक घोटालों के लिए कोई माननीय न तो दण्डित हुआ है और न ही घोटाले के करोड़ों रूपये इनसे निकाले जा सके हैं और दूसरे, परोक्ष रूप में अपने मामलों के लिए ये स्वयम् ही न्यायाधीश नहीं बनाए जा सकते। सीवीसी / पीएसी की विपरीत रपट आयी तो सत्ता-पक्ष — सीबीआई ने जाँच शुरू कर दी तो विपक्ष हाय तौबा मचाने लगता है। वैसे भी सीबीआई जैसी सरकारी जाँच एजेन्सियों की विश्वसनीयता संदिग्ध हो चली है। सरकार इसका इस्तेमाल या तो विरोध करने वालों को ब्लैकमेल करने के लिए करती है या उन्हें तबाह करने की नीयत से( जैसा कि अभी-अभी आचार्य रामदेव, उनके सहयोगी आचार्य बालकृष्ण, जगन रेड्डी आदि के संदर्भ में देखते हैं।) जैसे ही विरोधियों को मनाने की कवायद फेल होती है, अचानक ये एजेन्सियाँ सक्रिय हो उठती हैं। तब सत्ता-पक्ष बड़ी शान से खुली धमकी देता है— आपके पास पुलिस है तो हमारे पास सीबीआई। मजबूरन माननीय उच्चतम न्यायालय को जाँच की मॉनिटरिंग का अतिरिक्त भार उठाना पड़ता है, ताकि जाँच निष्पक्ष और बिना किसी दबाव के पूरी हो सके।

आज अन्ना के नेतृत्व में देश एक निष्पक्ष तथा स्वतन्त्र मॉनिटरिंग एजेन्सी चाहता है जो ख़ुद किसी भी मामले की जांच शुरु करने का अधिकार रखता हो। इसमें किसी से जांच के लिए अनुमति लेने की ज़रूरत नहीं हो। जो केवल परामर्श न दे बल्कि जिसके पास किसी भी सरकारी अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई की क्षमता होगी। जिसको नियुक्त करने वाली समिति में उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, दोनो सदनों के नेता, दोनो सदनों के विपक्ष के नेता, क़ानून और गृह मंत्री नहीं, अपितु न्यायिक क्षेत्र के लोग, मुख्य चुनाव आयुक्त, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, भारतीय मूल के नोबेल और मैगासेसे पुरस्कार के विजेता जैसे जनता के नुमाइंदे हों। जो भ्रष्टाचार की जाँच एक साल में पूरी करे और उसके एक साल में अदालती कार्यवाही पूरी कर घोटाले की रकम वसूल कर सके।

अब कुछ लोग इसे संसद की सर्वोच्चता पर संकट मानते हों तो उन्हें जानना चाहिये कि हमारा संविधान प्रजातन्त्र में जनता को सर्वोच्च मानता है। शेष सारी संस्थाएँ उसके हित का साधन मात्र हैं। और जनता कह रही है,-

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है

वैसे भी संसद सर्वोच्च है, सांसद नहीं। यदि जनता की सम्पत्ति के लुटेरे अपने तिकड़मों अथवा विधान के छिद्रों का लाभ लेकर विधायिका और कार्यपालिका में पहुँच जाएँ तो लोकतन्त्र की रक्षा को

मैं भी अन्ना, तुम भी अन्ना, अब तो सारा देश है अन्ना

Friday, August 5, 2011

गोद लिये हुलसी फिरै

ऐसे समय जबकि हिन्दू समाज अपने धर्म,संस्कृति,स्वावलम्बन,आत्मविश्वास आदि के प्रति पूर्णतः निराश होकर अपने को निर्बल और असहाय मानकर डाँवाडोल स्थिति में था, तब तुलसीदासजी ने निर्बल के बल राम का मंत्र फूँककर उसमें नवजीवन का संचार किया। उन्होंने श्रीरामचरितमानस रचा और सभी समस्याओं का एकसाथ समाधान कर दिया। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की इन पंक्तियों में महाकवि तुलसीदास की महानता का समस्त अर्थ छिपा है। महाकवि गोस्वामी तुलसीदास की लेखनी ने वह कार्य कर दिखाया जो आज तक किसी कवि ने नहीं किया। तत्कालीन हिन्दू समाज पूरी तरह हताश हो चुका था। योगियों, तांत्रिकों, महन्तों, मठाधीशों ने उसे नाना भाँति नचाया और फँसाया था। कोई तीर्थ, व्रत, उपवास आदि का खंडन करके निराकार की उपासना का ज्ञान दे रहा था, किसी ने उसे पिंड में ही ब्रह्मांड और ब्रह्म को खोजने की सलाह दी तो कोई योग के चमत्कार का गान कर रहा था। जनता ने सबको सुना, सबका पालन किया किन्तु हताश देखती रही कि मंदिर टूट रहे हैं, मठ ढहाये जा रहे हैं, योगी खदेड़े जा रहे हैं और सारे साधन काम नहीं आ रहे हैं। हताश समाज मन ही मन उस अव्यक्त को पुकारने लगा था जो गीध को, शबरी को, केवट को, पत्थर बनी अहल्या को--समाज के हर पीड़ित, दलित और उपेक्षित वर्ग को अपनी करुणा से सराबोर कर सके, जो राष्ट्र-यज्ञ में लीन ऋषियों को अपने धनुष की छाया दे सके और आश्वस्ति देते हुए कहे,--

निर्भय यज्ञ करहु तुम्ह साईं

इस भयानक हताशा में आर्तनाद करती जनता को अत्याचार और अनाचार के विरुद्ध खड़े नीलोत्पल घनश्याम,रणरंगधीर, लोकरंजक,लोकाश्रय राम की अभयदायिनी घोषणा--

निसिचर हीन करौं मही’..

महाकवि के स्वर में गूँज उठी। जनता को अवलम्ब मिल गया और ग्रीयर्सन को भगवान बुद्ध के बाद भारत का लोकनायक।

गोस्वामीजी की महानता का एक पक्ष यह है कि आजीवन तिरस्कार सहकर भी मर्यादा का आदर्श ओझल नहीं होने दिया। बांदा जिले के राजापुर गाँव में सम्वत् 1554 की श्रावण शुक्ल सप्तमी को अभुक्तमूल में जन्मे अनाथ रामबोला को मुनिया दाई और उसके बाद उसकी सास परबतिया ने अकाल काल-कवलित होने से बचाया था। बाल्यावस्था दुत्कार और घोर विपन्नता में बीती। रामबोला की बाल्यावस्था की करुणगाथा इन पंक्तियों में सिमट गयी है,

मातु पिता जग जाय तज्यौ, विधिहू न लिखी भाल भलाई

तनु तज्यौ कुटिल कीट ज्यों, त्यौं तज्यौ मातु पिताहू

बारे ते ललात बिललात द्वार द्वार दीन,जानत हौं चार फल चार ही चनक को

भिखारियों से जूठन के लिये भी दुत्कारे जाते रामबोला को बाबा नरहरिदास ने तुलसी नाम दिया और काशी ले आए। सम्वत् 1561 की माघ शुक्ल पंचमी को यज्ञोपवीत संस्कार हुआ। आचार्य शेष सनातन के आश्रम में शिक्षा पूरी की। ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी, सम्वत् 1583 में रत्नावली के साथ विवाह हुआ। अपनेपन और प्रेम के लिये तरसते तुलसी का अतिशय प्यार पत्नी के उपालम्भ का कारण बन गया

लाज न आवत आपको दौरे आयहु साथ

धिक धिक ऐसे प्रेम को कहा कहौं मैं नाथ

अस्थि चर्ममय देह मम ता मैं ऐसी प्रीती

तैसी जो श्रीराम मँह होत न तौ भवभीती

और फिर घर-पत्नी-पुत्र को त्याग बुद्ध की तरह ही शुरु होती है लोकनायक की समन्वयकारी लोकमंगल-साधना। रामतत्व की खोजयात्रा शुरु हो गई। लोकरंजन में बाधक थी संस्कृत, अतः तमाम विरोधों के बावजूद लोकनायक ने लोकभाषा को स्वीकार किया। अयोध्या में संवत् 1631 को श्रीरामनवमी के दिन बह निकली श्रीरामकथा मंदाकिनी

जब तें रामु ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए।

दो वर्ष,सात महीने और छब्बीस दिनों में श्रीरामविवाह से शुरू हुई मर्यादापुरुषोत्तम की कीर्ति-गाथा श्रीरामविवाह के ही दिन संवत् 1633 को स्वान्तःसुखाय भाषा निबद्ध हो गई। जीवन के अंतिम क्षणों (श्रावण शुक्ल सप्तमी संवत् 1680) तक लोक-कल्याण की भावना का संवेदना के रुप में प्रकटीकरण, जो हृदयवाद की सर्वश्रेष्ठ विशेषता है, को तुलसी की रचना में सर्वत्र देखा जा सकता है। तुलसी के राम, जन के कष्ट देख रो पड़ते हैं, उनकी आँखों से आँसू छलकने लगते हैं। दूसरों के कष्टों से विगलित हो उठने वाले श्रीराम की गाथा भाषा में वही गा सकता था जो अतिवादी दृष्टि का परित्याग कर समस्त विरोधी तत्वों तथा गतिरोधों के कारणों का परिष्कार कर समाज में सहयोग और एकता की भावना उत्पन्न कर सकता था, जो लोक के हित में एक समन्वयात्मक दृष्टिकोण को स्वीकार करता हो। और इस अर्थ में गोस्वामीजी का कोई सानी नहीं। मूर्तिमान भक्ति के स्वरूप हैं गोस्वामीजी,--

तुलसी जिनके मुखन ते धोखेउ निकसत राम,

तिनके पग की पानही मेरे तन की चाम

शैवों-वैष्णवों के विवाद का निदान स्वयं श्रीरामप्रभु के मुख से कर दिया है,

शिवद्रोही मम दास कहावा। सो नर सपनेहु मोहि न भावा।।

अगुण-सगुण का समन्वय करती पंक्ति

सगुनहि अगुनहि नहि कछु भेदा

भक्ति तथा ज्ञान में कौन श्रेष्ठ है, इसका उत्तर इस चौपाई में मिल जाता है

ज्ञानहि भक्तिहि नहि कछु भेदा। उभय हरहि भव सम्भव खेदा।।

तत्कालीन साहित्य में प्रचलित दोनों भाषाओं,- ब्रज और अवधी- का प्रयोग और लोकसाहित्य की सभी शैलियों का समन्वय उनकी कीर्तिगाथा कह रहा है। महाकवि ने अपने काव्य में विश्व-व्याप्त मानव धर्म और परमोदार भावनाओं को मार्मिक रीति तथा रोचकता से उभारा है किन्तु मर्यादा का अतिरेक कहीं नहीं किया है। शिव-विवाह का प्रसंग हो,

जगत मातु पितु संभु भवानी। तेहिं सिंगारु न कहउँ बखानी।।,

या श्रीराम-विवाह का,--

सिय सोभा नहिं जाइ बखानी। जगदम्बिका रुप गुन खानी।।

गोस्वामीजी ने कहीं भी मर्यादा का अतिक्रमण नहीं होने दिया है। तुलसी के लिये लोककल्याण ही आत्मकल्याण है। भक्ति जहां आत्मकल्याण का मार्ग खोलती है वहीं लोककल्याण का मार्ग भी प्रशस्त करती है। उनकी भक्ति में आत्मकल्याण और लोककल्याण दोनों का समन्वय है। वास्तव में लोककल्याण तभी सम्भव है जब व्यक्ति का कल्याण हो। लोक अंततः व्यष्टि का ही समष्टि रुप है। इस अर्थ में तुलसी की व्यक्ति-साधना लोकसाधना का ही रूप है। धर्म, राजनीति, साहित्य सबकी एकमात्र कसौटी है- लोकहित। यह तुलसी के लोकवादी रूप की पहचान है। राम इस लोकहित के संघर्ष में तुलसी की आत्मशक्ति के प्रतीक हैं। जब शासकों द्वारा सतत शोषित और दुर्भिक्ष की ज्वाला से दग्ध प्रजा की आर्थिक और सामाजिक स्थिति किंकर्त्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में पहुंच गई

खेती न किसान को, भिखारी को न भीख,
बलि,वनिक बनिज को न, चाकर को चाकरी।
जीविका विहीन लोग सीद्यमान सोच बस,
कहैं एक एकन सों कहाँ जाई, का करी ।।

तब लोकरंजक आदर्श उद्घाटित हो उठता है,--

जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृप अवसि नरक अधिकारी।।

समकालीन कृष्णभक्त कवियों की तरह जन-विच्छेद की ऐकान्तिक साधना से परे और निर्गुणियों की पहेलीपूर्ण दुरूह हो गई भाषा से हटकर श्रीराम के आदर्श का गान कोरा भजन नहीं, भाव की पराकाष्ठा है। प्रोफेसर बड़थ्वाल के शब्दों में मानव प्रकृति के क्षेत्र में जो उपासना है, अभिव्यंजना के क्षेत्र में वही साहित्यिक हो जाता है। गोस्वामीजी ने सूर, जायसी और कबीर की पँक्तियों को समेट कर अपनी कला के लिए न केवल भारतीय इतिहास का सर्वोत्तम कथानक ही चुना वरन उसकी लपेट के साथ ही काव्य के कमनीय कोमल कलित कलेवर की माधुरी से सभी को मुग्ध कर दिया, परंतु साथ ही अपने वर्ण्य-विषय आध्यात्मिक तत्व की प्रधानता को कभी शिथिलता नहीं दी।

लोकनायक का यह आदर्श काशी में फैले प्लेग में कर्मरूप में सामने आता है। उनके द्वारा स्थापित अखाड़ों के शताधिक युवक उनके नेतृत्व में प्लेग को परास्त करने में जुट गये। कोरा आदर्श नहीं, आदर्श का क्रियमाण उदाहरण बन गया महाकवि का जीवन। तभी तो तुलसीदास का काव्य, लोक-संस्कृति का अभिन्न अंग बन गया है। स्वान्तः सुखाय लिखी रघुनाथ गाथा हर व्यक्ति का कण्ठहार बन गई है। हिन्दू समाज के लिए धर्म ग्रन्थ, नीति ग्रन्थ, काव्य ग्रंथ यदि कोई है तो श्रीरामचरितमानस है। रहीम के शब्दों में कहें तो,

रामचरितमानस विमल, संतन जीवन प्रान।

हिन्दुआन को वेद सम, यवनहि प्रगट कुरान।।

और हो भी क्यों न, बाबा के सामने काव्यादर्श आइने के समान स्पष्ट है--

'कीरति, भनित, भूति भलि सोई,

सुरसरि सम सब कर हित होई।'

(कविता,कीर्ति और धन-सम्पदा तभी अच्छी है जब गंगाजी के समान उससे सबका भला हो)। इसीलिये तो मधुसूदन सरस्वती बोल पड़ते हैं,

"आनन्दकानने हि अस्मिन् जंगमः तुलसीतरुः,

कवितामंजरी भाति रामभ्रमर भूषिता।"

"इस आनन्दकानन में चलते-फिरते तुलसी-तरु की कविता-मंजरी पर रामरुपी भौंरा सदा मंडराया करता है।"

जिन्हें कृत्रिमता छू भी नहीं पाई है, जिनकी व्यापकता का रहस्य स्वयम् की अनुभूति की सत्यता तथा स्पष्टता में छिपा है, उन महान् लोकनायक को शतशः नमन।

शील भूषण शर्मा,