कल जब आम चुनाव हो रहे थे,
तब ‘एनसीपी से मुक्ति के बिना महाराष्ट्र का विकास सम्भव नहीं है, ये काहे के
राष्ट्रवादी हैं, ये भ्रष्टाचारवादी हैं, नेचुरली करप्ट पार्टी के नेता से बड़ा
भ्रष्ट कोई नहीं’
और दिल्ली चुनाव में आम
आदमी पार्टी से बुरी तरह मुँह की खाने के बाद शिवसेना की जहर से बुझे तीर की तरह
चुभती बातों के उत्तर में आज मौकापरस्त गठजोड़ की घृणित आकांक्षा को ‘लोकतंत्र की खूबसूरती’ के नाम पर जस्टिफाई करते
हुए, ‘हमारे (मोदी के) और शरद राव के बीच महीने में 2-3 बार बात नहीं होती हो, ऐसा
कोई महीना नहीं है’ का प्रवचन गले नहीं उतरता। एक प्रश्न कि असमय उपजी यह
प्रीति क्या है? क्या सत्तावर्ग के आपसी मतभेद की नूराकुस्ती दिखाने वाली यह छोटी सी दिखने
वाली बात ‘रैयतों’ के लिए एक सबक है कि शासक वर्ग में आने वाले चेहरे अलग-अलग हो सकते हैं, पर
उनमें न कोई मतभेद है, न कोई मनभेद? वे आपस में सौ और पाँच अलग- अलग हो सकते हैं, किन्तु बाहर
वालों (आम जनता) के लिए एक सौ पाँच भाई हैं।
क्या यही कारण है कि
महाराष्ट्र में अब तक सिंचाई घोटाले में कोई गिरफ्तारी नहीं हुई, जिसके प्रमुख
आरोपी प्रिय बन्धु(?) शरद राव के भतीजे अजीत पवार हैं? या सोची-समझी रणनीति के
तहत स्पेस रखकर तोते को पिंजरे में बन्द रखा गया है? या क्या प्रधानमंत्री जी आगामी चुनावों के लिए
जनता को आगाह करना चाह रहे थे कि चुनाव के पहले जुमलेबाजी करते रहेंगे, कभी ‘बाप-बेटी की सरकार’, ‘ कभी बाप-बेटे की सरकार’, ‘कभी अर्बन नक्सल’ तो कभी ‘देशद्रोही’ के शिगुफे छोड़कर किसी दूसरे राजनेता को
बार-बार अपमानित करते दिखेंगे तथा चुनाव के बाद मिल कर चाय पर आपसी गुफ्तगू
करेंगे। रैयतों का शासकवर्ग से सम्बन्धित किसी भी व्यक्ति पर ऊंगली उठाने का कोई
अधिकार नहीं है।
पर क्या बात इतनी ही छोटी
है? चुनावों में नेताओं पर आरोप-प्रत्यारोप को व्यक्तिगत मसला बना लेने वाली
संवेदनशील जनता की भावना के साथ खिलवाड़ नहीं है यह सामन्ती मनोवृत्ति?
आप तो साहब हैं, हुक्मराँ
हैं, पर साहब, जब जनता 105 भाई का जवाब देगी आगामी चुनावों में तो बिहार, यूपी को
दिल्ली बनते देर नहीं लगेगी।
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