Tuesday, September 3, 2013

खबरें और भी हैं भाई....


आज आसन्न सीरियाई संकट और बासी हो चुके किन्तु अन्य खबरो पर टीआरपी में भारी पड़ रहे आसाराम-प्रकरण के बावजूद चार खबरें ध्यान आकर्षित कर रही हैं...पहली खबर पर गुजरात के डी आई जी बंजारा की हाई वोल्टेज चिट्ठी और भाजपा नेताओं पर किया गया तथाकथित स्टिंग ऑपरेशन है, जिसे अबतक छुपाने और तथाकथित अपराधियों को कानून के खिलाफ सहयोग देने के आरोप में कोई गिरफ्तारी होती है या नहीं-- यह देखना काफी दिलचस्प होगा क्योंकि स्टिंग-सीडी निर्माता–निर्देशक.... सालभर सीडी (यदि सीडी असली है) दबाए रखा अथवा सीडी फर्जी है--इन दोनों मामलों में शासन और कानून दोनों के अपराधी हैं ...... वैसे भी जेल में ट्रायल और न्याय की अंतहीन-सी प्रतीक्षा में अकुलाए बंजारा और अन्य पुलिसकर्मियों को वादामाफी की बात से बरगलाकर अपना उल्लू सीधा करने का संदेह तब विश्वास में बदल  जाता है जब सीडी जारी करने और बंजारा की दस पेजी चिट्ठी लिखने का मुहूर्त कांग्रेसी पंडितों ने एक ही समय पर तय किया।
दूसरी खबर सांवैधानिक संस्थाओं के प्रति कांग्रेसीनिष्ठा (जिसे परिभाषित करना अत्यन्त दुष्कर है) की झलक दिखलाती है। श्री लालकृष्ण आडवाणी के भाजपा द्वारा तथाकथित अपमान, एक वरिष्ठतम राजनीतिज्ञ की पार्टी द्वारा उपेक्षा और घर के बुजुर्ग को उद्धत, अहंकारी तथा स्वार्थलोलुप कल के आए छोकरों के द्वारा तिरष्कृत करने पर वुफ्-वुफ् करने वाले कांग्रेसी पट्टाधारियों को सदन में यह तक याद नहीं रहा कि सदन में विपक्ष के नेता हाथ जोड़े कुछ बोलने की इजाजत माँग रहे हैं और सदन स्थगित कर दी जाती है तथा पीएम सदन छोड़कर चले जाते हैं.....इसे कहते हैं संसदीय परम्परा के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने की कांग्रेसी शैली....
तीसरी खबर हास्य का अनूठा उदाहरण है (आप भले मर्माहत हो जाएँ) मुलायम सिंह की अनमोल वाणी । वह कहते हैं कि कथनी और करनी में अंतर नहीं होना चाहिए। पर उपदेश कुशल बहुतेरे.... निराला की पंक्तियाँ....लाज लजाती जिसकी कृति से धृति उपदेशक वह है...क्या इसी उक्ति को भाँपकर लिखी गई थीं!
और अंत में आज 4.8.2013 के दैनिक सहारा में छपी एक खबर जो आम जनता के लिए वज्रपात सरीखी किन्तु मीडियाए लोगों के लिए उपेक्षणीय है—प्रति डॉलर रुपया 72 तक हो सकता है। साफ है कि उसपर ध्यान देना या दिलाना लोकतंत्र का यह महान स्तम्भ अपनी हेठी समझता है... उसकी दृष्टि में न तो इस खबर की कोई अहमियत है और न ही टीआरपी वैल्यू...... उन्हें तो राष्ट्रहित में दुबराने के लिए दो ही खबर काफी है...आसाराम को मक्खियों-मच्छरो ने रातभर परेशान किया. आसाराम की जमानत याचिका पर विचार कल... तथा घर और बाहर दोनों जगह घिरे मोदी...

Thursday, August 15, 2013

... और यह जीवन समर्पित


दो देश थे...पुष्पावर्त और पाषाणावर्त। एक बार पाषाणावर्त के राजा महोदर राजकीय निमंत्रण पर पुष्पावर्त आए। पुष्पावर्त के राजा महीपाल ने उनका पुरजोर स्वागत किया, पर स्वागत में न सेना दिखी, न ही कोई शासकीय ऐश्वर्य। होदर ने हँसकर कहा, क्या बात है, आपके यहाँ सेना नहीं है क्या?” महीपाल ने कहा कि हमारे यहाँ सैन्य-छावनी नहीं है। होदर ने आश्चर्य प्रगट करते हुए पूछा, “तब आप राजकोष की सुरक्षा कैसे करते हैं। महीपाल ने बताया कि उनके यहाँ राजकोष जैसी व्यवस्था नहीं है। यह सुनते ही होदर ने खिल्ली उड़ाने के भाव में कहा, “तब तो मैं बड़ी आसानी से पुष्पावर्त पर कब्जा कर सकता हूँ या मनचाही कीमत देकर यहाँ की जनता को खरीद सकता हूँ
महीपाल ने हँसकर टाल दिया। शाम को दोनों राज्य-भ्रमण पर निकले। राजकिले से बाहर निकलते ही होदर आश्चर्य से चिल्ला उठा..अरे यह क्या? दरअसल सामने पूर्ण अनुशासित, शस्त्रसज्जित व्यूहबद्ध सेना मानों आदेश की प्रतीक्षा में खड़ी थी तथा एक तरफ खाली स्थान में अकूत धन-सम्पदा रखी थी।
आश्चर्यचकितहोदर को इंगित कर महीपाल ने कहा, “हमने आज आपकी बात सुनकर मुनादी करवाई थी कि देश को प्राण न्योछावर करनेवाले सपूतों की आवश्यकता है ताकि ताकत के नशे में चूर कोई देश इसपर आक्रमण करने का साहस न कर सके तथा कोष की आवश्यकता है ताकि कोई धनोन्मत्त देश इसकी जनता को बिकाऊ न समझ सके। परिणाम आपके सामने है। यह देश अपने सशक्त समृद्ध राष्ट्रभक्त नागरिकों के द्वारा पूर्ण सुरक्षित और समृद्ध है...आप क्या कहते हैं?”
होदर लज्जित भाव से कभी महीपाल को, कभी सामने के दृष्य को देखता खड़ा रह गया....
 
क्या हमारा देश पुष्पावर्त नहीं बन सकता......

Tuesday, March 26, 2013

जल-संरक्षण को दैनन्दिन व्यवहार बदलें, त्योहार नहीं


           जल-संरक्षण को दैनन्दिन व्यवहार बदलें, त्योहार नहीं
अभिमान करने योग्य हमारी शानदार परम्परा के माथे की रोली.... लो आ गयी हमारी चिरप्रतीक्षित रंगों भरी  होली.....इस अवसर पर कुछ तथाकथित नामछपासी खोजियों को दुनिया के कुछ त्योहारों को हमारी होली के समकक्ष बतलाने में आत्मगौरव का बोध हो रहा है तो कुछ परोपदेशे पाण्डित्य वाले छपासी इस अवसर पर स्वयम् को महामानव सिद्ध करने पर तुले हैं। विकसित देशों का जो स्वभाव है कि वे अपनी जरूरत के लायक 80-85% उर्जा का उपभोग करना कम नहीं करते किन्तु उर्जा-स्रोतों के खत्म होने का डर दिखाकर दूसरी-तीसरी दुनिया को उर्जा के किफायती प्रयोग की नसीहत दे बैठते हैं। ठीक उसी प्रकार धनोन्मत्तों के प्रतिनिधि बने कुछ मीडिया-भड़ासी तू कौन मैं खामख्वाह की तर्ज पर पानी की मितव्ययिता का पाठ पढ़ाने लगते हैं। एक बानगी देखिए....
"हम सब जानते हैं कि महाराष्ट्र सहित देश के कुछ हिस्से इस समय घनघोर सूखे की आपदा से जूझ रहे हैं। सूखा सिर्फ कुछ किसानों की किस्मत पर ही बर्बादी की दास्तां नहीं लिखता, बल्कि एक संदेश भी देता है कि हमारी धरती के नीचे जमा जल सूख रहा है। तालाब भरते नहीं, सदानीराओं का जल कम हो गया है और कुओं की तली ऊपर से साफ दिखने लगी है। हम एक प्यासे और अतृप्त भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में आशंका की काली परछाइयों से लड़ने के लिए यकीनन हमें अपने अंदर बदलाव लाना होगा। हमारे त्योहार हमेशा परिवर्तन के प्रतीक रहे हैं। क्यों न इस होली हम खुद को बदलें और पास-पड़ोस के लोगों को पानी के कम-से-कम दुरुपयोग की सलाह दें?"( दैनिक हिन्दुस्तान के 24 मार्च 2013 के अंक में शशिशेखर)
अचानक बड़ी भावुक हो उठे हैं बरसाती कुकुरमुत्तों की तरह उग आए कुपथ-कुपथ रथ दौड़ाता जो.. टाइप पथनिर्देशक। इतने वर्षों में 25 दिसम्बर को जलने वाली मोमबत्तियों और पटाखों पर प्रदूषण का कभी खयाल नहीं आया, गंगा-यमुना में गिरने वालीं कसाईखानों में कटते मवेशियों के खून की नदियाँ कभी इनको आन्दोलित-करुणाविगलित नहीं करतीं, यहाँ नई दिल्ली में आँख के नीचे यमुना में गिरते बजबजाते सीवर तथा हजारों कारखानों के रासायनिक मलबों वाले नालों पर इन श्रीमान सर्वज्ञानियों की लेखनी शायद ही मचली हो, लेकिन बदरंग और बदमजा करने के लिए कलम सर्र-सर्र चल निकलती है..... जो लिख दो कूड़ा-कर्कट छप जाएगा....अपना ही है प्रेस काम कब आएगा
महामानव दिखने की होड़ में भूल जाते हैं कि यदि वे धनपशुओं को प्रतिदिन कुत्ते नहलाने-चराने में, लॉन्स सींचने में तथा 10-12 महँगी कारें धोने में पानी बरबाद न करने का उपदेश दे सकें, फैक्ट्रीज में पानी के किफायती प्रयोग करने तथा फैक्ट्रीज का प्रदूषित पानी अपनी सदानीराओं में नहीं डालने को मना सकें तो हमारी होली बदमजा न होगी।
अरे यदि ऐसे लक्ष्मीवाहन स्वयं अपनी कार एक दिन न धोते तथा अपने लॉन-गमलों में पानी डालना बन्द कर देते तो भी महाराष्ट्र की यह स्थिति न होती।