Wednesday, June 3, 2015

भारतीय लोकतंत्र में ‘शाइलॉक’ की आहट


रेल मंत्रालय ने आगामी 1 जुलाई 2015 से सुविधा ट्रेनें (मूल ट्रेनों की डुप्लीकेट ट्रेनें) चलाने का पैसला किया है। राजधानी, दुरंतो और मेल-एक्सप्रेस की तर्ज पर तीन प्रकार की ये सुविधा ट्रेनें पहली जुलाई से अधिक यात्री-दबाव वाले (मसलन बिहार, बंगाल, पूर्वांचल जाने वाले) रेलमार्गों पर चलाई जाएँगी। अधिक भीड़ होने पर पूर्ण वातानुकूलित डबर डेकर सुविधा ट्रेनें चलाने का प्रस्ताव भी रेल मंत्रालय ने तैयार किया है। साथ ही इन ट्रेनों की समयबद्धता का भी विशेष खयाल रखा जाएगा। कहा यह जा रहा है कि इसका उद्देश्य यात्रियों को दलालों के चंगुल से बचाना और थोड़ा अधिक किराया देकर आरामदेह सफर बनाना है।

परन्तु महत्वपूर्ण बात यह है कि इन ट्रेनों का किराया सामान्य ट्रेनों के मुकाबले काफी अधिक होने की आशंका है। प्रति 20 % सीट बुक होने के बाद मूल किराए में डेढ़ गुने से 3 गुने तक की वृद्धि की योजना है। प्रारम्भिक किराए में भी थोड़ा अधिक का मतलब मूल किराए में 20 से 25% की वृद्धि तथा तत्काल का शुल्क देना पड़ सकता है। यानि अब पटना, बलिया, छपरा या कोलकाता जाने के लिए एक जैसी दो ट्रेनों की समान श्रेणी के किराए में आसमान-जमीन का अन्तर हो सकता है।

सोचने की बात है कि यह सुविधा जनहित में हैं या लोक-मजबूरी का फायदा उठाने की वणिक्-योजना। आखिर समान सेवा के लिए जरूरतमन्दों को अधिक पैसा देने को बाध्य करना तथा देना हो तो दो नहीं तो भाड़ में जाओ की पुंजीवादी मानसिकता लोक कल्याणकारी लोकशाही में कहाँ तक उचित है। और फिर नियमित ट्रेनों में सीटों की नकली किल्लत दिखाकर तथा सुविधा ट्रेनों में झूठे भरे सीट दिखाकर अधिक पैसे ऐंठने की ब्लैकमार्केटिंग पर लगाम कौन लगाएगा जबकि सरकार ही अब ब्लैकियर के नए किरदार में अवतरित हो रही है। कहाँ तो एक तरफ गरीब रथ जैसी अनेक ट्रेनों की आस में थी जनता और कहाँ यह और अधिक मुनाफा कमाने की लालच में सीने पर का एक पॉण्ड मांस काटने को व्याकुल भाजपा सरकार की महात्वाकांक्षी शाइलॉक योजना....

वसूला गया अतिरिक्त पैसा किसकी जेब में जाएगा यह बात दिगर है, पर आम जनता की जेब तो कटेगी ही। अबतक दलालों, ब्लैकमार्केटियों और जमाखोरों के चंगुल में फँसी आम जनता को राहत देने की बात तो दूर सरकार ही अब इन तमाम किरदारों को निभाने की तैयारी करती दिख रही है। इतनी सी बात पर ही बस हो जाए, ऐसा दिखता नहीं है। अधिक कीमत चुकाकर समय पर रसोई गैस (बिल्कुल ब्लैक की तर्ज पर), पेयजल, बिजली, लोक यातायात अथवा शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत आवश्यकताओं पर भी सरकार के इन बिजनेस-मैनेजर्स की कुदृष्टि नहीं पड़ेगी- इसकी क्या गारण्टी है।

प्रधानमंत्री जी, आपको और आपके तथाकथित राष्ट्रभक्त रत्नों को देश की अबतक की अराजक-नृशंस लुटेरी सरकारों के द्वारा पूर्णतः शोषित जनता ने अपना प्रतिनिधि चुनकर आप पर और आपकी पार्टी पर अहसान किया है। निरीह जनता की मजबूरियों का यह कहकर शोषण न करें कि जब ब्लैक मार्केटियर्स को सुविधा शुल्क के रूप में रिश्वत दे सकते हो तो सरकार को क्यों नहीं

ध्यान रहे सरकार! घपले, घोटाले, बेईमानी पैसे की चोरी को ही नहीं बल्कि एक का तीन वसूलने को भी कहते हैं। गरीब-असहाय जनता को लूट कर क्योटोबनाने से सरकारी रक्तपायियों का खून पीने का पाप नहीं धुलेगा... गाय मारकर जूते दान करने की योजनाओं को विराम दें नहीं तो तख्त बदल दो ताज बदल दो, बेईमानों का राज बदल दोहोते देर नहीं लगेगी।

 

Wednesday, March 4, 2015

यूपी निज़ाम का नया फतवा, होली मनेगी 12 बजे तक

उत्तर प्रदेश निज़ाम अब तक सांप्रदायिक सोच से मुक्त नहीं हुआ है। चुनाव की आहट के बीच बदमिजाज शासन ने एक बार फिर अपने नाकारापन पर पर्दा डालने की कोशिश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश की है। उत्तरप्रदेश को बार-बार 2000 के दशक में धकेलने के प्रयास में खेला जानेवाला राजनैतिक षड़यंत्र इस बार वाराणसी के डी.एम. के तुगलकी फरमान के रूप में सामने आया है। रंगों के जिस त्योहार को याद मात्र कर भारत का जनमानस बिना किसी भेद-भाव के समरस हो जाता है, दुश्मनी के भाव तिरोहित हो जाते हैं, मन-प्राण उमंगों में डूबने-उतराने लगता है, उसको  भी एक मामूली कारण का बहाना बना विवादित करने का प्रयास किया गया है। 'होली सिर्फ 12 बजे तक क्योंकि जुम्मे की नमाज का वक्त हो जाएगा', का फरमान वाराणसी जैसे आस्था के शहर में वास्तव में सांप्रदायिक उन्माद फैलानेवाले तत्वों को समाज में जहर घोलने का मौक़ा देगा। यदि शासन ऐसे ही बेलगाम फतवा जारी करता रहा तो विजया दशमी, दीपावली, मकर संक्रांति, गणेशोत्सव की कौन कहे, झारखण्ड का प्रतीक उत्सव 'श्रीरामनवमी' भी टुच्चे कारणों से विवादों में घिरा होगा।
हमारा धर्मनिरपेक्ष संविधान राज्य को सभी सम्प्रदायों से समान दूरी रखते हुए पक्षपातरहित बर्ताव को निर्देशित करता है। किसी एक सम्प्रदाय के प्रति अतिशय प्रेम का प्रदर्शन, सम्प्रदाय विशेष का संरक्षण अथवा बलात हस्तक्षेप की आज्ञा संविधान ने राज्य को नहीं दी है। ऐसे में इस तरह का शासनादेश संविधान की मूल भावना के साथ खिलवाड़ करता प्रतीत होता है। आदर्श स्थिति यह होती कि स्थानीय प्रशासन की भूमिका एक साझा मंच उपलब्ध कराने तक सीमित होती, जहाँ दोनों समुदायों के प्रभावशाली व्यक्ति आपस में सलाह मशविरा कर एक सर्वमान्य निर्णय लेते। धार्मिक मामलों में जनता की जितनी सहभागिता होगी, शांति और सौहार्द्र का वातावरण उतना ही स्थायी और मजबूत होगा। 
त्तरप्रदेश के समाजवादी निज़ाम को समझना ही होगा कि होली महज हिन्दुओं का त्योहार ही नहीं अपितु, भारत की आत्मा का संगीत है। इसके साज के साथ मामूली छेड़छाड़ की कोशिश भी सांस्कृतिक ताने-बाने के बड़े ध्वंस को आमंत्रित कर सकती है। इस प्रकार की मानसिकता से जारी किये गए तुगलकी फरमान प्रतिक्रियावादी ताकतों को  जमीन उपलब्ध कराता है तथा उन्हें सर उठाने का मौक़ा देता है।  शासन इस तरह के मामलों में पूर्वाग्रही होने से बचे तो ही समाज समरस होगा।    


Tuesday, March 3, 2015

चुप्पी कहीं महंगी न पड़ जाए

अगर मेरी बेटी या बहन शादी से पहले किसी के साथ संबंध रखती है या ऐसा कोई काम करती है जिससे उसके चरित्र पर आंच आती है तो मैं उसे अपने फ़ार्महाउस ले जाकर पेट्रोल छिड़ककर पूरे परिवार के सामने जला दूंगा”, यह कथन शर्मनाक तथा स्तब्ध कर देने वाला तो है, किन्तु यह जानकर, कि यह बात निर्भया काण्ड को अंजाम देने वाले पागल दरिन्दों के वकील ए. पी. सिंह की है, भारत में कानून की किताबों को रटकर उसका धन्धा चलाने वाले धनलोलुप भेड़ियों के कानून के मंदिर में घुसने की इजाजत देने तथा भारत में बोलने की स्वतंत्रता या कुछ भी बकने की आजादी का फर्क व्याख्यायित करने के पुनर्विचार की आवश्यकता महसूस होती है।ऐसा नहीं कि यह बात इसी एक नरपशु ने कही है, बल्कि कानून तथा संविधान को ठोकरों पर रख देने की हिमाकत करते दूसरा वकील तो एक कदम आगे जाकर बयान दे देता है। दूसरा काले दिल वाला एम. एल. शर्मा कहता है, हमारे समाज में हम लड़कियां को किसी अनजान व्यक्ति के साथ शाम 7:30 या 8:30 के बाद घर से बाहर नहीं निकलने नहीं देते, और आप लड़के और लड़की की दोस्ती की बात करती हैं? सॉरी, हमारे समाज में ऐसा नहीं होता है. हमारी कल्चर बेस्ट है। हमारी कल्चर में महिला के लिए ऐसी कोई जगह नहीं है
जब वकीलों(?) की यह राय है तो भला दरिन्दा चुप कैसे बैठे? बलात्कार के वक़्त उसे (निर्भया को) विरोध नहीं करना चाहिए था। उसे चुपचाप बलात्कार होने देना चाहिए था। अगर ऐसा होता तो हम उसे बिना कोई नुकसान पहुंचाए छोड़ देते। बस उसके दोस्त की पिटाई की जाती
पर समाज के सीने पर पैर रखने का यह दुःसाहस क्या इन राक्षसों को ऐसे ही मिल गया है? क्या यूँ ही बेधड़क अपनी हिंसकता का प्रचार करते ऐसे दरिन्दे बेशर्मी से समाज में खुले घूमते रहे हैं? बात समाज में फैलते एक बड़े सामाजिक खतरे के साथ प्रशासकीय खतरे की ओर इशारा कर रही है। एक तो समाज के माथे का ऐसा कलंक और पूरी हिमाकत के साथ उसका महिमामण्डन तो दूसरी तरफ फाँसी की सजा प्राप्त दुर्दान्त भेड़िये की जेल में इंटरव्यू की इजाजत? कई बार तो लगता था कि इन भेड़ियों के वकीलों ने सिर्फ अपनी पेशेगत मजबूरियों के तहत इस तरह का केस लड़ना स्वीकार किया होगा। पर नहीं यह तो विषवृक्षों की पूरी पौध बड़ी हो चुकी है। इनका साथ देने के लिए हमारे सांवैधानिक ढाँचे के तहत ही जहर सींचने वाले कुछ माली भी पूरी तन्मयता से कमर कसे बैठे हैं। संविधान अधिकारों में नारी-पुरुष को अलग नहीं मानता। फिर ए. पी. सिंह तथा एम. एल. शर्मा जैसे वकीलों पर देश में घृणा के बीज बोने तथा स्त्री जाति के प्रति असाधारण हिकारत प्रदर्शित करने के जुर्म में अब तक मुजरिम क्यों नहीं बनाया गया? क्यों नहीं जेल के सम्बन्धित अधिकारियों के खिलाफ इस तरह के इंटरव्यू जेल में करने की इजाजत देने पर कोई कारवाई हुयी? क्यों नहीं बार काउन्सिल ऑफ इण्डिया काले कपड़े में काले दिलोदिमाग वाले इस तरह के नरपिशाचों को कानून के मंदिर में प्रवेश वर्जित कर देता है?
समाज जानता है कि पागल कुत्तों का चाटना और काटना दोनों ही समाज के लिए खतरनाक है। रही बात मुकेश जैसे कुत्तों की, तो उन्हें एक बार जनता के बीच छोड़ देने पर उन्हें समझ में आ ही जाएगा कि इस तरह की हरकत करने पर सात पुश्तें कैसे काँप जाती हैं।

Saturday, February 28, 2015

बजट यानि ग्राम्यविकास का रोडमैप

वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कल्याणकारी योजनाओं के लिए अपर्याप्त धन आवंटित करते इस बजट में गांवों में रहने वाले 70%  लोगों पर निगाह फेरने की जहमत उठाई हो, नकार-वादियों को शायद ऐसा नहीं दिखे। परन्तु सर्वसमावेशी सामाजिक सुरक्षा की दीर्घगामी जमीन तैयार करते इस बजट का फायदा उन 70% लोगों को मिलेगा, जिनके पास न तो कंप्यूटर है  फेसबुक या ट्वीटर पर लिखने-पढ़ने के लिएन तो अख़बार-पत्रिकाएं खरीदने या पढ़ने की औकात और न ही बिजलीटेलीविज़नफ़ोन-मोबाइल के बारे में कुछ भी जानकारी। 
छह करोड़ शौचालय बनाने का लक्ष्यजिसमें 2014-2015 में 50 लाख शौचालय बन चुके हैंजन धन योजना में 12 रुपये के प्रीमियम पर 2 लाख रुपये के दुर्घटना बीमा का सुरक्षा-कवच तथा मौजूदा वित्त वर्ष में 80000 सरकारी विद्यालयों के विकास का संकल्प सचमुच विकासगामी ग्राम्य-भारत की राह प्रशस्त करता दिख रहा है। सब्सिडी-रिसाव को रोकने का संकल्प तथा मुद्रा-बैंक की अवधारणा निम्न-आय वर्ग को निश्चित ही इंटरप्रेनरशिप के लिए प्रोत्साहित करती दिख रही है। ग्राम्य इंफ्रास्ट्रक्चर विकास में 25000 करोड़ का आबंटन, अटल पेंशन योजना, 'नयी मंजिलजैसी दूरदृष्टि योजनाओं के निश्चित ही लाभकारी परिणाम मिलेंगे यदि इन्हें महज लफ्फाजी के लिए प्रयुक्त न किया गया हो।  
परन्तु आंकड़ों की बाजीगरी दर्शाते वित्तमंत्री ने रक्षा मद में 7.74% की वृद्धि की बात कही है, जो 2 लाख 46 हजार 727 करोड़ रूपये हो गयी है. रक्षा आबंटन में GDP की तुलना में कमी आयी है, जो देश की सुरक्षा के लिए ठीक नहीं है  2013 में रक्षा-आबंटन कुल सकल घरेलू उत्पाद का 1.8% था,जो 2014 में 1.75% तथा चालु बजट में घटकर 1.74% हो गया है. चीन और पाकिस्तान के खतरों के बीच रक्षा आबंटन में आयी यह कमी चिंतित करनेवाली है। 
बजट में यदि दवाओं को महंगा करने तथा कम दाम के जूतों, मिनरल वाटर, नींबूपानी, शीतल पेय, सीमेंट, जूट के बोरे जैसी सामान्य उपभोक्ता-वस्तुओं की मूल्य वृद्धि पर लगाम लगाया गया होता तो सचमुच बजट पिछली सरकार के दुःस्वप्न सरीखे अनुभवों को भुलाने में सफल हो गया होता। फिर भी विकास का रोडमैप तैयार करता यह बजट सिर्फ आंकड़ों की बाजीगारी नहीं है. इसमें विजन और इम्प्लीमेंटेशन दोनों है। 

Friday, February 27, 2015

चित भी मेरी, पट भी मेरी' वाले तर्क अब नहीं चलेंगे


कश्मीर में एक बार फिर विपरीत ध्रुवों के नए गठबंधन की तैयारी हो रही है. इसके पहले भी 'यदि जोड़-तोड़ से गद्दी मिले तो ऐसी सत्ता को चिमटे से भी नहीं छुऊँगा' वाले वाजपेयी ने उस नेशनल कॉन्फ्रेंस से समझौता किया था, जिसके आलाकमान को संघ परिवार राष्ट्रद्रोही और इस नाते अस्पृश्य मानता आ रहा था. तब वहां जो हुआ था, देश नहीं भूला है. आज भाजपा के शिखर पुरुष मोदी 'राष्ट्रद्रोही? बाप-बेटी' के बाप मुफ़्ती मोहम्मद सईद से जिस अंदाज में भर अंकवार गले मिले उसे देखकर 'जहाँ हुए बलिदान मुखर्जी', नारे की हकीकत समझ में आ गयी. इस गठबंधन को भाजपा के आधारविन्दु धारा 370 की तिलांजलि देकर और पाकिस्तानी घुसपैठियों को नागरिकता देने पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने को कृतसंकल्प होकर भाजपा ने अपनी सत्तालिप्सा मानों जतला दी. गठबंधन पाकिस्तान को भी कश्मीर मामले का एक पक्ष मानने वाली पीडीपी तथा कश्मीर पर किसी प्रकार का बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार करने का ढिंढोरा पीटनेवाली भाजपा ने अंजाम दिया है. सैद्धांतिक रूप से एकदम विपरीत दोनों दलों का यह कुटिल गठबंधन कितने दिन चलेगा, इस पर संदेह है. कश्मीर में सेना को आतंकियों पर कार्रवाई के लिए औचक छानबीन का विशेषाधिकार देने वाले कानून AFSPA का सर्वाधिक मुखर विरोध करती रही पीडीपी के साथ के साथ भाजपा का यह अनैतिक गठबंधन राज्य की जनता का कितना भला करेगा यह तो समय ही बतलायेगा. लेकिन एक बात स्पष्ट है कि कार्यकर्ता अपने बचाव में नए तर्कों की खोज में बेचैन हो गए होंगे. ये वही भाजपाई है जो कांग्रेसियों, कम्युनिस्टों, सपाइयों, बसपाइयों  को पानी पी-पीकर कोसते रहे हैं. जिन्हें अपनी तथाकथित राष्ट्रवादी राजनैतिक विरासत पर इतना घमंड रहा है कि अपने सामने इन्हें पूरा हिंदुस्तान राष्ट्रद्रोही दिखता रहा है. सत्ता-प्राप्ति के लिए ऐसा घृणित गठबंधन करना ही था, तो चुनावों में अपनी भाषा थोड़ी संयत रखते ताकि कार्यकर्ताओं को थोड़ा स्पेस मिलता,
साहब, 'चित भी मेरी, पट भी मेरी' वाले तर्क अब जनता को हजम नहीं होंगे. विचारधारा की जमीन से ऊपर उड़कर नारों के बलपर कुर्सी से चिपके रहने की आकांक्षा ने कम्युनिस्टों को कहीं का नहीं छोड़ा। सम्पाती बनने की चाह इस बार भाजपा के पंख न झुलसा दे. 

Saturday, February 21, 2015

क्या आत्ममुग्ध केंद्र चीन की चाल समझ पायेगा?

चीन ने प्रदेश की स्थापना से जुड़े आयोजनों में शामिल होने के लिए प्रधानमंत्री मोदी की अरुणाचल प्रदेश यात्रा का विरोध किया है। चीन का कहना है कि दोनों देशों के बीच सीमा विवाद सुलझाने के कारगर तरीकों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। प्रधानमंत्री की मई में चीन की संभावित यात्रा के ठीक पहले आयी चीन की यह आक्रामक प्रतिक्रिया दिल्ली-बीजिंग के असहज होते संबंधों की झलक है वास्तव में ड्रैगन की विस्तारवादी सोच ने भारतीय शांतिप्रियता को हमेशा ही कमजोरी समझा है 2011 से प्रतिवर्ष बढ़ते अस्थाई सीमा का अतिक्रमण भारत के लिए चिंता का विषय है शायद ड्रैगन इतिहास की पुनरावृति करना चाह रहा है इसके पहले भी चीन ने 1950-51 में अपने नक़्शे में भारत के विशाल भूभाग को अपना हिस्सा दिखाया था 1954 में बद्रीनाथ के पास के 'बड़ा होती' को अपना इलाका बताते हुए भारतीय क्षेत्रों में लगातार घुसपैठ करता हुआ, हमारी तत्कालीन सामरिक कमजोरी तथा आर्थिक विपन्नता का फायदा उठाते हुए चीन ने 1962 में पीठ पर छूरा मारते हुए 1600 वर्गमील भूभाग पर नाजायज कब्जा जमा लिया था 
चीन ने पहले ही अक्साई चीन को रणनीतिक दृष्टि से काफी विकसित कर लिया है  26 अक्टूबर 1947 को कश्मीर के महाराज हरि सिंह ने पूरे कश्मीर का भारत में विलय स्वीकार कर लिया थापरन्तु, कबाइलियों की मदद से अनपेक्षित आक्रमण की बदौलत पाकिस्तान ने कश्मीर के एक विस्तृत भूभाग पर अवैध कब्ज़ा कर लिया था, जिसका लगभग एक तिहाई हिस्सा 5180 वर्ग किलोमीटर भूभाग उसने मार्च, 1963 में चीन को उपहार स्वरुप दे दिया था आज यह हिस्सा अक्साई चीन कहलाता है, जिसे भारतीय सीमा पर चीन ने महत्वपूर्ण सैन्य क्षेत्र के रूप विकसित कर लिया है दूसरी तरफ पूरे अरुणाचल प्रदेश को दक्षिण तिब्बत का हिस्सा बताकर भारत पर लगातार दबाव बनाता रहा है और अब उसकी टेढ़ी नजर सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश पर है
ऐसी स्थिति में एक दृढ राजनैतिक इच्छाशक्ति के साथ ही इस क्षेत्र में उन्नत संसाधनों के तीव्र विकास से ही भारत चीन को दबाव में ला सकता है केंद्र का भावुक राजनयिक शिष्टाचार कहीं 1962 वाली आत्मघाती भूल न करा बैठे। ड्रैगन की सर्द मुस्कुराहट के बीच बदलती उसके माथे की शिकन पर नजरें गड़ाए रखनी पड़ेंगी। 
भयंकर तूफ़ान की आशंकाओं के बीच यक्षप्रश्न- क्या आत्ममुग्ध  केंद्र चीन की चाल समझ पायेगा?

Saturday, February 14, 2015

बिहार, यूपी को दिल्ली बनते देर नहीं लगेगी


कल जब आम चुनाव हो रहे थे, तब एनसीपी से मुक्ति के बिना महाराष्ट्र का विकास सम्भव नहीं है, ये काहे के राष्ट्रवादी हैं, ये भ्रष्टाचारवादी हैं, नेचुरली करप्ट पार्टी के नेता से बड़ा भ्रष्ट कोई नहीं

और दिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी से बुरी तरह मुँह की खाने के बाद शिवसेना की जहर से बुझे तीर की तरह चुभती बातों के उत्तर में आज मौकापरस्त गठजोड़ की घृणित आकांक्षा को लोकतंत्र की खूबसूरती के नाम पर जस्टिफाई करते हुए, हमारे (मोदी के) और शरद राव के बीच महीने में 2-3 बार बात नहीं होती हो, ऐसा कोई महीना नहीं है का प्रवचन गले नहीं उतरता। एक प्रश्न कि असमय उपजी यह प्रीति क्या है? क्या सत्तावर्ग के आपसी मतभेद की नूराकुस्ती दिखाने वाली यह छोटी सी दिखने वाली बात रैयतोंके लिए एक सबक है कि शासक वर्ग में आने वाले चेहरे अलग-अलग हो सकते हैं, पर उनमें न कोई मतभेद है, न कोई मनभेद? वे आपस में सौ और पाँच अलग- अलग हो सकते हैं, किन्तु बाहर वालों (आम जनता) के लिए एक सौ पाँच भाई हैं।

क्या यही कारण है कि महाराष्ट्र में अब तक सिंचाई घोटाले में कोई गिरफ्तारी नहीं हुई, जिसके प्रमुख आरोपी प्रिय बन्धु(?) शरद राव के भतीजे अजीत पवार हैं? या सोची-समझी रणनीति के तहत स्पेस रखकर तोते को पिंजरे में बन्द रखा गया है? या क्या प्रधानमंत्री जी आगामी चुनावों के लिए जनता को आगाह करना चाह रहे थे कि चुनाव के पहले जुमलेबाजी करते रहेंगे, कभी बाप-बेटी की सरकार, कभी बाप-बेटे की सरकार’,  कभी अर्बन नक्सल तो कभी देशद्रोही के शिगुफे छोड़कर किसी दूसरे राजनेता को बार-बार अपमानित करते दिखेंगे तथा चुनाव के बाद मिल कर चाय पर आपसी गुफ्तगू करेंगे। रैयतों का शासकवर्ग से सम्बन्धित किसी भी व्यक्ति पर ऊंगली उठाने का कोई अधिकार नहीं है।

पर क्या बात इतनी ही छोटी है? चुनावों में नेताओं पर आरोप-प्रत्यारोप को व्यक्तिगत मसला बना लेने वाली संवेदनशील जनता की भावना के साथ खिलवाड़ नहीं है यह सामन्ती मनोवृत्ति?
आप तो साहब हैं, हुक्मराँ हैं, पर साहब, जब जनता 105 भाई का जवाब देगी आगामी चुनावों में तो बिहार, यूपी को दिल्ली बनते देर नहीं लगेगी।

 

Friday, February 13, 2015

जनता की बेआवाज लाठी से डरिये हुजूर



दिल्ली चुनाव में भाजपानाथ का'अर्बन नक्सल', 'देशद्रोही', 'उपद्रवी गोत्र', 'भगोड़ा' आज सामंती शैली के तमाम हथियारों को कुंद कर दिल्ली के मुख्यमंत्री पद पर प्रतिष्ठित होगा. आम चुनावों में मिली विजय का 'मदभाजपाशीर्ष के दिमाग पर चढ़ता दिख रहा था. केजरीवाल को अराजक बताने वाली भाजपा की केंद्र सरकार ने चुनाव में लोकतंत्र के प्रमुख गुणधर्म 'सहिष्णुता' को ही ताक पर रख दिया था. बिल्डर लॉबी के दबाव में पूरी लोकतान्त्रिक परम्परा को दरकिनार कर जनता के सीने पर पांव रखकर भूमि अधिग्रहण बिल के अध्यादेश में सामंती अहंकार की पराकाष्ठा देखी जनता ने. अपने विरोध से पलटी मारते हुए पश्चिमी देशों से ख़ारिज परमाणु-बिजली-कंपनियों को बेलगाम कर यहां आमंत्रित करने वाले अपनी हार का ठीकरा जनता की तथाकथित विकासविरोधी सोच पर फोड़ रहे हैं. आश्चर्य होता है कि भाजपानाथ की प्रिय सी.एम. उम्मीदवार के तर्कों पर कि 'उनकी हार फतवे के कारण हुई' के लिए उन्हें भारतरत्न की मांग अब तक नहीं उठी. 
पर प्रश्न प्रासंगिक है कि, क्या जनता ने इतना प्रचंड समर्थन केजरीवाल के सस्ते पानी-बिजली के लोभ में दिया? क्या जनता सचमुच इतनी लोभी और विवेकहीन है कि उसे इस तरह से बरगलाया जा सकता हैक्या दिल्ली के मतदाताओं ने केंद्र सरकार के द्वारा परोक्ष रूप से नौ महीने के दिल्ली पर 'सुशासन'(?) की अनदेखी की? क्या दिल्ली नहीं समझ पाई कि तीनों नगरनिगम पर काबिज भाजपाइयों के बावजूद यहाँ की गलियों की स्थिति किसी पुराने नारकीय शहर से बदतर हैं तो इसके लिए भाजपा उत्तरदायी नहीं है? क्या केवल किरण बेदी के सी. एम. बन जाने के बाद ही दिल्ली की पुलिस महिलाओं की सुरक्षा पर ध्यान देती? अब तक नौ महीने केन्द्र सरकार के हाथ ही बंधे हुए थे? शायद भाजपा अपनी गलतियों पर सोचना ही नहीं चाहती।
क्या भाजपा कभी सोच पायेगी की दिल्ली ने उसे दण्डित किया है.- अमेरिका में 1986 से प्रतिबंधित परमाणु-बिजली-कंपनियों को आमंत्रित कर भोपाल त्रासदी की पुनरावृति को अधीर तथाकथित राष्ट्रवादी पार्टी द्वारा जनता के सर्वस्व को दाव पर लगा देनेखोखले विकास के नाम पर भूखे धनपशुओं को जनता पर निरंकुश छोड़ने के लिए. 
सच यही है कि जनता अब नयी अर्थनीति चाहती है कि  जिससे 125 करोड़ माइनस 100 घराने स्वतंत्र हों अपनी आजीविका के लिए, उनका विकास-मॉडल उनके सम्मान की कीमत पर नहीं तैयार किया जाए. 
जनता को हवाई लफ़्फ़ाज़ी में उलझाकर भ्रमित करने की जगह जनता के लिए कुछ करें हुजूर, नहीं तो 'तख़्त बदल दो, ताज बदल दो' होते देर नहीं लगेगी।


Tuesday, February 10, 2015

दिल्ली-कुल-गोत्र ने 'उपद्रवी गोत्र' को अपनाया


आज 'नसीब वाला' 'बदनसीब अर्बन नक्सल' के साथ चाय पीने को अधीर हो गया, 'भगोड़ा' को दिल्ली ने 'रणछोड़जू' बना दियादिल्ली-कुल-गोत्र ने 'उपद्रवी गोत्र' वाले की पीठ ऐसी थपथपाई कि भाजपा सारी जुमलेबाजी और लफ़्फाज़ियां ही भूल गयी. कांग्रेस मुक्त भारत का दिवास्वप्न 'भाजपा मुक्त दिल्ली' की घबराहट में बदल गया. 
दिल्ली चुनाव में अनावश्यक आरोप, अपमानजनक गालियां यहां तक कि 'देशद्रोही' तक कह जाना,चुभती कार्टूनबाज़ी और भारी शक्तिप्रदर्शनमंत्रियों, सांसदों और प्रवक्ताओं की भाषा-शैली में दम्भ-घमण्ड और बड़बोलेपन का लगातार बढ़नाभूल गयी भाजपा कि आज़ादी के बाद लगातार ठगी गयी जनता कभी भी इतना बेवक़ूफ़ नहीं रही कि इस प्रकार की जुमलेबाजी और लफ़्फाज़ियों के झांसे में आ जाये। 4 बच्चे-40 बच्चे, रामजादे-?रामजादे, एके 49 जैसे जुमले जनता को मानों चिढाती रही.
कांग्रेस की पराजय को अपना विजय मानकर, स्वयं की सरकार को जनता के लिए अपरिहार्य समझकर और जनादेश को अपनी योग्यता मानकर भाजपाशीर्ष कॉंग्रेस की भाषा बोलने लगा. केजरीवाल को अराजक बताने वाली भाजपा की केंद्र सरकार ने अब तक लोकतंत्र के प्रमुख गुणधर्म 'सहिष्णुता' को ही ताके पर रख दिया  था.  अनावश्यक अध्यादेशों के बल पर संसदीय लोकतंत्र को दरकिनार करनापश्चिमी देशों से ख़ारिज परमाणु-बिजलीघरों के लिए जनता के सर्वस्व को दाव पर लगा देना तथा खोखले विकास के नाम पर दवा, बिल्डर, शिक्षा जैसी लॉबियों के दबाव में जनता पर 'अपनी उद्योगपति-हितैषी और आमजन-विरोधीनिर्णय थोपना--यदि यही राजकता है तो जनता ने इसे नकार दिया है. दिल्ली ने केजरीवाल को इस बार ऐसे प्रचंड बहुमत से गद्दी दी है जो शायद ही किसी को नसीब हो. यह विनम्रता और नीयत के लिए उनको पुरस्कार ही नहीं मिलाभाजपा को लोकसभा और मंत्रिमंडल में दर्शाये अहंकार के लिए  दण्डित भी किया  भी है
यदि भाजपा शीर्ष नेतृत्व अब भी अपने कैडर की अनदेखी कर, कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़कर तथा जनता को हवाई लफ़्फ़ाज़ी में उलझाकर पैराशूट कैंडिडेट्स के भरोसे रही तो  सावधान
 'अजहूँ नाव समुंद्र मेंना जाने का होय'। कहीं कांग्रेस मुक्त भारत का भाजपा का सपना जनता भाजपा मुक्त भारत में न बदल देकही आगामी चुनावों में ऐसा न हो कि इस बार, अंतिम बार, भाजपा सरकार।