बृहस्पतिवार को चुनाव प्रचार थम गया. अचानक जैसे सन्नाटा पसर गया हो सड़कों पर. कल तक चौक चौबारों पर पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को ही सुनायी पड़ने वाले राष्ट्रभक्ति के गीत गूंज रहे थे. रिक्शों पर लगे पोस्टरों को देखकर ही समझ में आता था की चुनाव में उम्मीदवारों का प्रचार हो रहा है. उम्मीदवार चाहे जिस पार्टी का हो, रिक्शों पर लगे लाउडस्पीकर से एक ही तरह के गीत गूंज रहे थे. 'मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती', 'मेरा रंग दे बसंती चोला', 'यह देश है वीर जवानों का',
राष्ट्रभक्ति के इन गीतों की स्वरलहरियों के बीच भी जैसे कुछ खटक रहा था. भारतीय लोकतंत्र के इस सफर में जन सरोकार के मुद्दों को छूते-सहलाते और लोगों से बतियाते नारों की गूंज स्मृतिशेष होती दिख रही है. अब तो कॉंग्रेस-विरोध में बस 'पांच साल केजरीवाल', चलो चलें मोदी के साथ' जैसे दलों की सामुहिकता का गला घोंटते व्यक्तिप्रधान नारे थे या 'तुम्हारी कमीज हमसे सफ़ेद कैसे, कालिख पोतेंगे' की बेशर्मी . न कोई मुद्दा था, न ही कोई समस्या और न तो पार्टियों की आर्थिक नीतियों पर कोई चोट.
पहले प्रचार गाड़ियों पर गूंजते नारे समस्याओं से जूझते समाज की भावनाओं को मानों मूर्त रूप दे देते थे. 'तख़्त बदल दो ताज बदल दो बेईमानों का राज बदल दो', 'इंदिरा तेरे राज में भूख से बच्चे मरते हैं, भूख से बच्चे मरते हैं तो टाटा-बिरला बनते हैं, टाटा-बिरला की सरकार नहीं चलेगी नहीं चलेगी', 'हर जोर-जुल्म के टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है' जैसी दमदार चुनौतियां अब कहाँ? हाँ नहीं बदला तो कांग्रेस का रिक्शा.… जहाँ पहले 'आधी रोटी खाएंगे इंदिरा को ले आएंगे' का गान होता था वहीं अब 'टूट गयी विकास की डोर, चलो चलें कांग्रेस की ओर' का नारा कहीं कहीं पोस्टरों पर लिखा मिल रहा था.
पहले चुनाव लोकतंत्र का उत्सवपूर्ण मेला हुआ करता था. सुबह से ही नहा-धो कर, सज-सवंरकर लोग मेले का आनंद लेते चल पड़ते थे बूथों की ओर. बच्चों का उत्साह देखते बनता था. झंडियां लूटते, उड़ाते, बच्चे बूथों के पस… अब सोचना भी मुश्किल है.
क्या उत्सव प्रधान देश का लोकपर्व ऐसा ही होता है? क्या हमारे अंदर का लोकतंत्र मर रहा है या हम मार्सल लॉ के आदी होने लगें हैं.
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