Wednesday, March 4, 2015

यूपी निज़ाम का नया फतवा, होली मनेगी 12 बजे तक

उत्तर प्रदेश निज़ाम अब तक सांप्रदायिक सोच से मुक्त नहीं हुआ है। चुनाव की आहट के बीच बदमिजाज शासन ने एक बार फिर अपने नाकारापन पर पर्दा डालने की कोशिश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश की है। उत्तरप्रदेश को बार-बार 2000 के दशक में धकेलने के प्रयास में खेला जानेवाला राजनैतिक षड़यंत्र इस बार वाराणसी के डी.एम. के तुगलकी फरमान के रूप में सामने आया है। रंगों के जिस त्योहार को याद मात्र कर भारत का जनमानस बिना किसी भेद-भाव के समरस हो जाता है, दुश्मनी के भाव तिरोहित हो जाते हैं, मन-प्राण उमंगों में डूबने-उतराने लगता है, उसको  भी एक मामूली कारण का बहाना बना विवादित करने का प्रयास किया गया है। 'होली सिर्फ 12 बजे तक क्योंकि जुम्मे की नमाज का वक्त हो जाएगा', का फरमान वाराणसी जैसे आस्था के शहर में वास्तव में सांप्रदायिक उन्माद फैलानेवाले तत्वों को समाज में जहर घोलने का मौक़ा देगा। यदि शासन ऐसे ही बेलगाम फतवा जारी करता रहा तो विजया दशमी, दीपावली, मकर संक्रांति, गणेशोत्सव की कौन कहे, झारखण्ड का प्रतीक उत्सव 'श्रीरामनवमी' भी टुच्चे कारणों से विवादों में घिरा होगा।
हमारा धर्मनिरपेक्ष संविधान राज्य को सभी सम्प्रदायों से समान दूरी रखते हुए पक्षपातरहित बर्ताव को निर्देशित करता है। किसी एक सम्प्रदाय के प्रति अतिशय प्रेम का प्रदर्शन, सम्प्रदाय विशेष का संरक्षण अथवा बलात हस्तक्षेप की आज्ञा संविधान ने राज्य को नहीं दी है। ऐसे में इस तरह का शासनादेश संविधान की मूल भावना के साथ खिलवाड़ करता प्रतीत होता है। आदर्श स्थिति यह होती कि स्थानीय प्रशासन की भूमिका एक साझा मंच उपलब्ध कराने तक सीमित होती, जहाँ दोनों समुदायों के प्रभावशाली व्यक्ति आपस में सलाह मशविरा कर एक सर्वमान्य निर्णय लेते। धार्मिक मामलों में जनता की जितनी सहभागिता होगी, शांति और सौहार्द्र का वातावरण उतना ही स्थायी और मजबूत होगा। 
त्तरप्रदेश के समाजवादी निज़ाम को समझना ही होगा कि होली महज हिन्दुओं का त्योहार ही नहीं अपितु, भारत की आत्मा का संगीत है। इसके साज के साथ मामूली छेड़छाड़ की कोशिश भी सांस्कृतिक ताने-बाने के बड़े ध्वंस को आमंत्रित कर सकती है। इस प्रकार की मानसिकता से जारी किये गए तुगलकी फरमान प्रतिक्रियावादी ताकतों को  जमीन उपलब्ध कराता है तथा उन्हें सर उठाने का मौक़ा देता है।  शासन इस तरह के मामलों में पूर्वाग्रही होने से बचे तो ही समाज समरस होगा।    


Tuesday, March 3, 2015

चुप्पी कहीं महंगी न पड़ जाए

अगर मेरी बेटी या बहन शादी से पहले किसी के साथ संबंध रखती है या ऐसा कोई काम करती है जिससे उसके चरित्र पर आंच आती है तो मैं उसे अपने फ़ार्महाउस ले जाकर पेट्रोल छिड़ककर पूरे परिवार के सामने जला दूंगा”, यह कथन शर्मनाक तथा स्तब्ध कर देने वाला तो है, किन्तु यह जानकर, कि यह बात निर्भया काण्ड को अंजाम देने वाले पागल दरिन्दों के वकील ए. पी. सिंह की है, भारत में कानून की किताबों को रटकर उसका धन्धा चलाने वाले धनलोलुप भेड़ियों के कानून के मंदिर में घुसने की इजाजत देने तथा भारत में बोलने की स्वतंत्रता या कुछ भी बकने की आजादी का फर्क व्याख्यायित करने के पुनर्विचार की आवश्यकता महसूस होती है।ऐसा नहीं कि यह बात इसी एक नरपशु ने कही है, बल्कि कानून तथा संविधान को ठोकरों पर रख देने की हिमाकत करते दूसरा वकील तो एक कदम आगे जाकर बयान दे देता है। दूसरा काले दिल वाला एम. एल. शर्मा कहता है, हमारे समाज में हम लड़कियां को किसी अनजान व्यक्ति के साथ शाम 7:30 या 8:30 के बाद घर से बाहर नहीं निकलने नहीं देते, और आप लड़के और लड़की की दोस्ती की बात करती हैं? सॉरी, हमारे समाज में ऐसा नहीं होता है. हमारी कल्चर बेस्ट है। हमारी कल्चर में महिला के लिए ऐसी कोई जगह नहीं है
जब वकीलों(?) की यह राय है तो भला दरिन्दा चुप कैसे बैठे? बलात्कार के वक़्त उसे (निर्भया को) विरोध नहीं करना चाहिए था। उसे चुपचाप बलात्कार होने देना चाहिए था। अगर ऐसा होता तो हम उसे बिना कोई नुकसान पहुंचाए छोड़ देते। बस उसके दोस्त की पिटाई की जाती
पर समाज के सीने पर पैर रखने का यह दुःसाहस क्या इन राक्षसों को ऐसे ही मिल गया है? क्या यूँ ही बेधड़क अपनी हिंसकता का प्रचार करते ऐसे दरिन्दे बेशर्मी से समाज में खुले घूमते रहे हैं? बात समाज में फैलते एक बड़े सामाजिक खतरे के साथ प्रशासकीय खतरे की ओर इशारा कर रही है। एक तो समाज के माथे का ऐसा कलंक और पूरी हिमाकत के साथ उसका महिमामण्डन तो दूसरी तरफ फाँसी की सजा प्राप्त दुर्दान्त भेड़िये की जेल में इंटरव्यू की इजाजत? कई बार तो लगता था कि इन भेड़ियों के वकीलों ने सिर्फ अपनी पेशेगत मजबूरियों के तहत इस तरह का केस लड़ना स्वीकार किया होगा। पर नहीं यह तो विषवृक्षों की पूरी पौध बड़ी हो चुकी है। इनका साथ देने के लिए हमारे सांवैधानिक ढाँचे के तहत ही जहर सींचने वाले कुछ माली भी पूरी तन्मयता से कमर कसे बैठे हैं। संविधान अधिकारों में नारी-पुरुष को अलग नहीं मानता। फिर ए. पी. सिंह तथा एम. एल. शर्मा जैसे वकीलों पर देश में घृणा के बीज बोने तथा स्त्री जाति के प्रति असाधारण हिकारत प्रदर्शित करने के जुर्म में अब तक मुजरिम क्यों नहीं बनाया गया? क्यों नहीं जेल के सम्बन्धित अधिकारियों के खिलाफ इस तरह के इंटरव्यू जेल में करने की इजाजत देने पर कोई कारवाई हुयी? क्यों नहीं बार काउन्सिल ऑफ इण्डिया काले कपड़े में काले दिलोदिमाग वाले इस तरह के नरपिशाचों को कानून के मंदिर में प्रवेश वर्जित कर देता है?
समाज जानता है कि पागल कुत्तों का चाटना और काटना दोनों ही समाज के लिए खतरनाक है। रही बात मुकेश जैसे कुत्तों की, तो उन्हें एक बार जनता के बीच छोड़ देने पर उन्हें समझ में आ ही जाएगा कि इस तरह की हरकत करने पर सात पुश्तें कैसे काँप जाती हैं।