दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 26, कांग्रेस ने 32 और आम आदमी पार्टी ने 22 ऐसे प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है जो स्नातक नहीं हैं. यानि इस बार भी वर्ल्ड क्लास की राजधानी बनने की आकुलता में घिरी दिल्ली को अपने प्रतिनिधियों का शैक्षिक स्तर सुधारने की उम्मीद पूरी होती नहीं दिख रही है.
यूं तो, जनप्रतिनिधियों का शैक्षणिक स्तर बेहतर किये जाने की चर्चा लगातार ही की जाती रही है. लेकिन, प्रत्याशियों के चयन के समय सभी राजनीतिक दल आमतौर पर इसपर गंभीर नहीं दिखते. जिताऊ प्रत्याशी होने के मानकों में बाहुबल, धनबल, जातिबल आदि पर तो गंभीरता से चर्चाएं की जाती हैं परन्तु, प्रत्याशी-चयन में शायद कभी भी एकेडेमिक स्तर को मानक नहीं बनाया जाता. इस कारण एक ही दल के प्रत्याशियों के शैक्षणिक स्तर में काफी ज्यादा अंतर नजर आता है.दिल्ली विधानसभा के लिए इस बार हो रहे चुनावों में भी हालात जुदा नहीं है। तीनों ही पार्टियों में ऐसे प्रत्याशियों की संख्या काफी ज्यादा है, जिन्होंने स्नातक तक की पढ़ाई पूरी नहीं की है।
भारत के स्वाधीनता संग्राम की शीर्ष पंक्ति में जहां परा स्नातकों और स्नातकों की लम्बी सूची दिखती है, संविधान के निर्माण में शैक्षणिक योग्यता जहां वरदान साबित हुई थी तथा पहली संसद तथा पहला मंत्रिमंडल जहां ग्रेजुएट्स-पोस्ट ग्रेजुएट्स नगीनों से अंटे पड़े थे, वहीं आज शिक्षित होना शायद राजनीति में अयोग्यता या अभिशाप बन गया है.
लेकिन यह बहस का विषय हो सकता है कि शैक्षणिक योग्यता यदि इतनी ही जरूरी है तो फिर हमारे संविधान निर्माताओं ने प्रत्याशी के लिए इसे आवश्यक क्यों नहीं बनाया. शायद संविधान निर्माताओं ने इस बात का ध्यान रखा था की यदि नीयत सही हो तो नेतृत्व की राह में व्यक्ति का एकेडेमिक स्तर आड़े ना आये. इसी मूलभावना को अपना ढाल बनाती राजनीतिक पार्टियां चोरों, खून के आरोपियों, जमाखोरों, बुर्दाफरोशों तक पर विचार करती तथा अपना प्रत्याशी बनाती हैं, पर शिक्षा के लिए संविधान को ढाल बना लेती हैं.
ऐसी स्थिति में पढ़ाई क्या धनपशुओं की चाकरी के लिए करें आज के युवा?
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