Monday, February 9, 2015

बापू हम शर्मिन्दा हैं

'हमने महात्मा गांधी को गोली मारी थी और अगर केजरीवाल नहीं समझेंगे तो उसको भी गोली मारेंगे.सोशल मीडिया पर वायरल हिंदू महासभा के स्वामी ओम का यह विवादित बयान उन्माद की पराकाष्ठा है. आश्चर्य है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में नई दिल्ली सीट से केजरीवाल के खि‍लाफ चुनाव लड़ने वाले स्वामी ओम जैसे हिंस्र पशुओं को भी यह देश बर्दास्त करता है. विडिओ में माथे पर भाजपा के चुनाव चिन्ह वाली गेरूआ टोपी सजाए 'ओम' के गले की माला बलिपशु की माला जैसी ही दिखती है.   
जिस अधनंगे फ़क़ीर ने भारत की आजादी की बिखरी लड़ाई को एकसूत्र में पिरोया, देश के माथे पर कलंक की तरह बदनुमा 'अस्पृश्यता' के दाग को धोने को स्वयं 'कचरा-पट्टी' साफ़ ही नहीं किया, बल्कि, 'बा' के मना करने पर उनके परित्याग की धमकी दे डाली थी, 'सत्याग्रहऔर स्वावलम्बन के प्रतीक 'खादीको अस्त्र बना विदेशी वस्तुओं का ही नहीं, तो सत्ता को भी सफल चुनौती दे डाली थी और जिनसे मिलने को परमाणु-शक्ति के आविष्कर्ता अलबर्ट आइंस्टाइन बेचैन थे, उन भारतीय स्वाभिमान के प्रतीक युगपुरुष के प्रति अपशब्द कहनेवाले को पागलखाने में होना चाहिए. पागल को चुनाव लड़ने का अधिकार संविधान ने नहीं दिया है. 
आश्चर्य है कि जिन बापू ने जीवन भर हिंसक उन्माद की खिलाफत की, 'बिना खड्ग बिना ढालसत्य और अहिंसा की प्रत्यक्ष ताकत से देश को बर्तानी हुकूमत से मुक्त कराया तथा देश को 'खादी वस्त्र नहीं विचार है' के रूप में स्वावलम्बन का मजबूत आधार दिया, उनको भी देश कितनी आसानी से भूलता जा रहा है.  एक समय था जब राजनेता चुनाव में अपने विराधियों को चुनावी खर्च तक दे दिया करते थे , उसकी बातों को सहजता से सुनते थे, प्रतिक्रिया तार्किक हुआ करती थी और सदन हो या चौपाल असंसदीय भाषणों के लिए कोई स्पेस नहीं छोड़ते थे. आज अपने आका को प्रसन्न करने के लिए किसी भी स्तर तक गिरकर जहर उगल रहे है. 
देश के युवा अपने सामने ऐसे आदर्शों? को पाकर किस रह ओर चल पड़ेंगे, इन्हें न इसकी चिंता है और न ही ये शर्मसार होंगे। किन्तु एक बात अवश्य कौंधती है कि अपनी राजनीतिक लिप्सा की पूर्ति के लिए विरोधियों के प्रति ऐसी घृणा और ऐसा हिंसक विचार क्या पशु-बलि को उकसाता नहीं है?


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