रेल मंत्रालय ने आगामी 1
जुलाई 2015 से सुविधा ट्रेनें (मूल ट्रेनों की डुप्लीकेट ट्रेनें) चलाने का पैसला
किया है। राजधानी, दुरंतो और मेल-एक्सप्रेस की तर्ज पर तीन प्रकार की ये सुविधा
ट्रेनें पहली जुलाई से अधिक यात्री-दबाव वाले (मसलन बिहार, बंगाल, पूर्वांचल जाने
वाले) रेलमार्गों पर चलाई जाएँगी। अधिक भीड़ होने पर पूर्ण वातानुकूलित डबर डेकर
सुविधा ट्रेनें चलाने का प्रस्ताव भी रेल मंत्रालय ने तैयार किया है। साथ ही इन
ट्रेनों की समयबद्धता का भी विशेष खयाल रखा जाएगा। कहा यह जा रहा है कि इसका
उद्देश्य यात्रियों को दलालों के चंगुल से बचाना और ‘थोड़ा अधिक’ किराया
देकर आरामदेह सफर बनाना है।
परन्तु महत्वपूर्ण बात यह है
कि इन ट्रेनों का किराया सामान्य ट्रेनों के मुकाबले काफी अधिक होने की आशंका है।
प्रति 20 % सीट बुक होने के बाद मूल
किराए में डेढ़ गुने से 3 गुने तक की वृद्धि की योजना है। प्रारम्भिक किराए में भी
‘थोड़ा अधिक’ का मतलब मूल किराए में 20
से 25% की वृद्धि तथा तत्काल का शुल्क देना पड़ सकता है।
यानि अब पटना, बलिया, छपरा या कोलकाता जाने के लिए एक जैसी दो ट्रेनों की समान श्रेणी
के किराए में आसमान-जमीन का अन्तर हो सकता है।
सोचने की बात है कि यह सुविधा
जनहित में हैं या लोक-मजबूरी का फायदा उठाने की वणिक्-योजना। आखिर समान सेवा के
लिए जरूरतमन्दों को अधिक पैसा देने को बाध्य करना तथा ‘देना हो तो दो नहीं तो भाड़ में जाओ’ की पुंजीवादी मानसिकता लोक कल्याणकारी लोकशाही में कहाँ तक उचित है। और
फिर नियमित ट्रेनों में सीटों की नकली किल्लत दिखाकर तथा सुविधा ट्रेनों में झूठे
भरे सीट दिखाकर अधिक पैसे ऐंठने की ब्लैकमार्केटिंग पर लगाम कौन लगाएगा जबकि सरकार
ही अब ब्लैकियर के नए किरदार में अवतरित हो रही है। कहाँ
तो एक तरफ ‘गरीब रथ’ जैसी अनेक ट्रेनों की आस में थी जनता और कहाँ यह और अधिक मुनाफा कमाने की
लालच में ‘सीने पर का एक पॉण्ड मांस’
काटने को व्याकुल भाजपा सरकार की महात्वाकांक्षी ‘शाइलॉक योजना’....
वसूला गया अतिरिक्त पैसा किसकी
जेब में जाएगा यह बात दिगर है, पर आम जनता की जेब तो कटेगी ही। अबतक दलालों,
ब्लैकमार्केटियों और जमाखोरों के चंगुल में फँसी आम जनता को राहत देने की बात तो
दूर सरकार ही अब इन तमाम किरदारों को निभाने की तैयारी करती दिख रही है। इतनी सी
बात पर ही बस हो जाए, ऐसा दिखता नहीं है। अधिक कीमत चुकाकर समय पर रसोई गैस
(बिल्कुल ब्लैक की तर्ज पर), पेयजल, बिजली, लोक यातायात अथवा शिक्षा, स्वास्थ्य
जैसी मूलभूत आवश्यकताओं पर भी सरकार के इन ‘बिजनेस-मैनेजर्स’ की कुदृष्टि नहीं पड़ेगी- इसकी
क्या गारण्टी है।
प्रधानमंत्री जी, आपको और
आपके तथाकथित राष्ट्रभक्त रत्नों को देश की अबतक की अराजक-नृशंस लुटेरी सरकारों के
द्वारा पूर्णतः शोषित जनता ने अपना प्रतिनिधि चुनकर आप पर और आपकी पार्टी पर अहसान
किया है। निरीह जनता की मजबूरियों का यह कहकर शोषण न करें कि ‘जब ब्लैक मार्केटियर्स को सुविधा शुल्क के
रूप में रिश्वत दे सकते हो तो सरकार को क्यों नहीं’।
ध्यान रहे सरकार! घपले, घोटाले, बेईमानी पैसे की
चोरी को ही नहीं बल्कि एक का तीन वसूलने को भी कहते हैं। गरीब-असहाय जनता को लूट
कर ‘क्योटो’ बनाने से सरकारी
रक्तपायियों का खून पीने का पाप नहीं धुलेगा... गाय मारकर जूते दान करने की
योजनाओं को विराम दें नहीं तो ‘तख्त बदल दो ताज बदल दो,
बेईमानों का राज बदल दो’ होते देर नहीं लगेगी।