दिल्ली चुनाव में भाजपानाथ का'अर्बन नक्सल', 'देशद्रोही', 'उपद्रवी गोत्र', 'भगोड़ा' आज सामंती शैली के तमाम हथियारों को कुंद कर दिल्ली के
मुख्यमंत्री पद पर प्रतिष्ठित होगा. आम चुनावों में मिली विजय का 'मद' भाजपाशीर्ष के दिमाग पर चढ़ता
दिख रहा था. केजरीवाल को अराजक बताने
वाली भाजपा की केंद्र सरकार ने चुनाव में लोकतंत्र के प्रमुख गुणधर्म 'सहिष्णुता' को ही ताक पर रख दिया था. बिल्डर लॉबी के दबाव में पूरी
लोकतान्त्रिक परम्परा को दरकिनार कर जनता के सीने पर पांव रखकर भूमि अधिग्रहण बिल के अध्यादेश
में सामंती अहंकार की पराकाष्ठा
देखी जनता ने. अपने विरोध से पलटी मारते हुए पश्चिमी देशों से ख़ारिज
परमाणु-बिजली-कंपनियों को बेलगाम कर यहां आमंत्रित करने वाले अपनी हार का ठीकरा
जनता की तथाकथित विकासविरोधी सोच पर फोड़ रहे हैं. आश्चर्य होता है कि भाजपानाथ की
प्रिय सी.एम. उम्मीदवार के तर्कों पर कि 'उनकी हार फतवे के कारण हुई' के लिए उन्हें भारतरत्न की मांग अब तक नहीं उठी.
पर प्रश्न प्रासंगिक है कि, क्या जनता ने इतना प्रचंड
समर्थन केजरीवाल के सस्ते पानी-बिजली के लोभ में दिया? क्या जनता सचमुच इतनी लोभी और विवेकहीन है कि उसे इस
तरह से बरगलाया जा सकता है? क्या दिल्ली के मतदाताओं ने केंद्र सरकार के द्वारा परोक्ष रूप से नौ महीने के दिल्ली पर 'सुशासन'(?) की अनदेखी की? क्या दिल्ली नहीं समझ पाई कि तीनों नगरनिगम पर काबिज भाजपाइयों के बावजूद यहाँ की
गलियों की स्थिति किसी पुराने नारकीय शहर से
बदतर हैं तो इसके लिए भाजपा उत्तरदायी नहीं है? क्या
केवल किरण बेदी के सी. एम. बन जाने के बाद ही दिल्ली की पुलिस महिलाओं की सुरक्षा
पर ध्यान देती? अब तक नौ महीने केन्द्र
सरकार के हाथ ही बंधे हुए थे? शायद भाजपा अपनी गलतियों पर
सोचना ही नहीं चाहती।
क्या भाजपा कभी सोच पायेगी
की दिल्ली ने उसे दण्डित किया
है.- अमेरिका में 1986 से प्रतिबंधित परमाणु-बिजली-कंपनि यों
को आमंत्रित कर भोपाल त्रासदी की पुनरावृति
को अधीर तथाकथित राष्ट्रवादी पार्टी द्वारा जनता के सर्वस्व को दाव पर लगा देने, खोखले विकास के नाम पर भूखे धनपशुओं को जनता पर निरंकुश छोड़ने के लिए.
सच यही है कि जनता अब नयी अर्थनीति चाहती है कि जिससे 125 करोड़ माइनस 100 घराने स्वतंत्र हों अपनी आजीविका के लिए, उनका विकास-मॉडल उनके सम्मान की
कीमत पर नहीं तैयार किया जाए.
जनता को हवाई लफ़्फ़ाज़ी में
उलझाकर भ्रमित करने की जगह जनता के लिए कुछ करें हुजूर, नहीं तो 'तख़्त बदल दो, ताज बदल दो' होते देर नहीं
लगेगी।
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