माननीय अध्यक्ष महोदय,
देश का सर्वशक्तिमान् सामर्थ्यशाली परिवार इन्हें महाज्ञानी, अर्थशास्त्र में कौटिल्य का बाप और राजनीति में शुक्राचार्य मानता है। इनकी पादुका-पूजक तपस्या से प्रभावित होकर ही तो भारत का राज्य इनकी झोली में डाल दिया गया है- ‘......दिन्ह दिए दस माथ ’ .... इन्हें तो एक ही सिर और वह भी सिर्फ झुकाना भर पड़ा। अब ऐसे दयालु वंश के अजन्मे शिशुओं तक के प्रति निष्ठा तो बनती ही है हुजूर, क्योंकि
“श्रद्धावान् लभते नरः”
अर्थात् सर्वशक्तिमान् के चरणों के प्रति अन्ध श्रद्धावान् व्यक्ति ही सत्ता-सुख प्राप्त कर सकता है।तपस्या का तेज ही है कि वंश-विरुदावली गान में निपुण टोली के साथ भाट-चारणी परम्परा के दुर्धर्ष ध्वज-वाहक तेवारीबाबा इनको ज्ञात इतिहास का महान् ईमानदार सिद्ध करने पर तुले हुए हैं। अब यदि जनता उन्हें रीढ़विहीन, दुमहिलाऊ,अयोग्य और कठपुतली समझती है तो समझती रहे, यह भी जनता को ठेंगे पर रखते हैं।
“यो यथा माम् प्रपद्यन्ते तां तथैव भजाम्यहम्”.....
अभी बात पूरी भी नहीं हो पायी थी कि विपक्ष ने मेज की थाप पर मन्द्र सप्तक अलापना शुरु कर दिया....
“महंगाई डायन खाए जात है, सखी सैंया त खुबही कमात है-महंगाई डायन खाए जात है”। यह सत्तापक्ष का भ्रममात्र था या वास्तव में विपक्ष किसी की ओर देखकर गा रहा था----- सदन में तार सप्तक पर गालियों का मुशायरा गर्म हो उठा।अध्यक्ष महोदय ने किसी तरह खून के घूँट पीकर शान्ति स्थापित कर ली तो वक्ता ने आगे बोलना शुरु किया---“ सम्माननीय अध्यक्षजी, महंगाई जैसी प्राकृतिक आपदा पर विपक्ष का राजनीति करना कहाँ तक उचित...” बात पूरी भी नहीं हो पाई कि विपक्षी खेमे से... “शर्म करो-शर्म करो,......महंगाई को प्राकृतिक आपदा कहते शर्म आनी चाहिये”... का शोर आसमान छूने लगा।लगा कि बस आज विपक्ष हावी हो जायेगा कि तभी धीर-गम्भीर मनमोहनी सदन में गूँज उठी......
“माननीय अध्यक्षजी... शास्त्रों में लिखा है कि जनमेजय के नाग-यज्ञ से तक्षक की रक्षा इन्द्रासन ने की थी। इसीप्रकार मानवजाति के नागों--- कालाबाजारियों और जमाखोर धनपशुओं तथा उनके पालनहार शासकवर्ग का सम्बन्ध सहज दैवीय प्रकृति है।इसी प्रकृति की परिणति है—महंगाई।अब इस प्राकृतिक आपदा पर विपक्ष स्वार्थवश जो राजनीति कर रहा है,वह उचित नहीं है।हमारी सरकार महंगाई के प्रति काफी गम्भीर है।इस सन्दर्भ में हमने एक मंत्रीपरिषदीय आयोग गठित करने को सोचा है।माननीय अध्यक्षजी.... कैटरीना,रीटा,कार्ला,विल्मा जैसी प्राकृतिक आपदाओं की तरह ही बेकाबू इस आपदा का नामकरण टेनिस जगत की सनसनी ‘सानिया’ के नाम पर करने को सोचा है,जो हमारी गम्भीरता दिखाने को काफी है।” विपक्षी धीरज खो बैठे।सदन में हंगामा शुरु हो गया---“ सानिया क्यों,सोनि...”
अभी बात पूरी भी नहीं हो पायी थी कि मानो भूचाल आगया।शासककुल के अहं को ठेस लगी थी और विपक्ष समझने को तैयार नहीं था। महाशक्ति कहीं विराट विश्वरुप... घबराये अध्यक्षजी को मार्शली निवेदन करना उचित जान पड़ा।फलतः थोड़ी ही देर में,
‘ थी सभा सन्न सब लोग डरे,
चुप थे या थे बेहोश पड़े,
केवल दो नर न अघाते थे,
धृतराष्ट्र विदुर सुख पाते थे ।
कर जोर खड़े प्रमुदित निर्भय
दोनों पुकारते थे जय जय ’।
वैसे उन विजातीय जीवों को ‘ देख भ्रम होता था उनको, वानर थे वा नर थे ’।थोड़ी ही देर में श्मशान के सन्नाटे को मात देती संसद ‘अधरं मधुरं,वदनं मधुरं,वाणी मधुरा’ वाली अर्थशास्त्रीय मधुरतम मनमोहनी से गूँजने लगी।
“माननीय अध्यक्ष महोदय, हमने जागरुकता के अभाव में कुपोषण,अशिक्षा और बीमारियों के कारण मानव संसाधन की संरक्षा के लिये चुनौती बनती ‘बढ़ती मृत्युदर’ पर लगाम कसने के लिये मृत्युञ्जयी योजना ‘युवराज’ का श्रीगणेश किया है। उसी कोशिश का नतीजा है— भीषण महँगाई।भीषण महँगाई के कारण लोगों को भरपेट भोजन दुर्लभ हो गया है और लोग आधा पेट खाकर,पानी पी-पीकर सरकार को कोस रहे हैं।मुहावरे में ही सही,पानी की समस्या सुलझती दिख रही है,जबकि लोग दूना पानी पी रहे हैं—पी-पीकर।”
“महोदय, साम्यवादियों के पर कतर देने से प्राइवेटाइजेशन और बन्धनमुक्त श्रमकानून ‘तिगुना श्रम’ का रास्ता साफ कर चुके हैं, अर्थात् 8 घण्टे मात्र की जगह चौबीसों घण्टे बिना चूँ-चाँ किये रगड़ाना।अब आप ही सोचें कि पगलाने से कैसे बचेगा कोई? माथे का बाल नोचेगा, बेमतलब ठहाके लगायेगा”
“अध्यक्षजी, शास्त्र-निर्देशित चार चरणों वाली मृत्युञ्जयी योजना का निर्देशक मन्त्र है.....
भोजन आधा पेट कर, दूना पानी पीऊ,
तिगुना श्रम, चौगुनी हँसी, वर्ष शताधिक जीऊ ”