वित्तमंत्री अरुण
जेटली ने कल्याणकारी योजनाओं के लिए अपर्याप्त
धन आवंटित करते इस बजट में गांवों में रहने वाले 70% लोगों पर निगाह फेरने की जहमत उठाई हो, नकार-वादियों को शायद ऐसा नहीं दिखे। परन्तु सर्वसमावेशी सामाजिक सुरक्षा की दीर्घगामी जमीन तैयार करते इस बजट का फायदा उन 70% लोगों को मिलेगा, जिनके पास न तो कंप्यूटर है फेसबुक या ट्वीटर पर लिखने-पढ़ने के लिए, न तो अख़बार-पत्रिकाएं खरीदने या पढ़ने की औकात और न ही बिजली, टेलीविज़न, फ़ोन-मोबाइल के बारे में कुछ भी जानकारी।
छह करोड़ शौचालय
बनाने का लक्ष्य, जिसमें 2014-2015 में 50 लाख शौचालय बन चुके हैं, जन धन योजना में 12 रुपये के प्रीमियम पर 2 लाख रुपये के दुर्घटना बीमा का
सुरक्षा-कवच तथा मौजूदा वित्त वर्ष में 80000 सरकारी विद्यालयों के विकास का संकल्प सचमुच विकासगामी ग्राम्य-भारत की राह प्रशस्त करता दिख रहा है। सब्सिडी-रिसाव को रोकने का संकल्प तथा
मुद्रा-बैंक की अवधारणा निम्न-आय वर्ग को निश्चित ही इंटरप्रेनरशिप के लिए प्रोत्साहित करती दिख रही है। ग्राम्य इंफ्रास्ट्रक्चर विकास में 25000 करोड़ का आबंटन, अटल पेंशन योजना, 'नयी मंजिल' जैसी दूरदृष्टि योजनाओं के निश्चित ही
लाभकारी परिणाम मिलेंगे यदि इन्हें महज लफ्फाजी के लिए प्रयुक्त न किया गया हो।
परन्तु आंकड़ों की
बाजीगरी दर्शाते वित्तमंत्री ने रक्षा मद में 7.74% की वृद्धि की बात कही है, जो 2 लाख 46 हजार 727 करोड़ रूपये हो गयी
है. रक्षा आबंटन में GDP की तुलना में कमी आयी है, जो देश की सुरक्षा के लिए ठीक नहीं है। 2013 में रक्षा-आबंटन कुल सकल घरेलू उत्पाद
का 1.8% था,जो 2014 में 1.75% तथा चालु बजट में घटकर 1.74% हो गया है. चीन और पाकिस्तान के खतरों के बीच रक्षा आबंटन में आयी यह कमी चिंतित
करनेवाली है।
बजट में यदि दवाओं को महंगा करने तथा कम दाम के जूतों, मिनरल वाटर, नींबूपानी, शीतल पेय, सीमेंट, जूट के बोरे जैसी सामान्य
उपभोक्ता-वस्तुओं की मूल्य वृद्धि पर लगाम लगाया गया होता तो सचमुच बजट पिछली
सरकार के दुःस्वप्न सरीखे अनुभवों को भुलाने में सफल हो गया होता। फिर भी विकास का
रोडमैप तैयार करता यह बजट सिर्फ आंकड़ों की बाजीगारी नहीं है. इसमें विजन और
इम्प्लीमेंटेशन दोनों है।
No comments:
Post a Comment