चीन ने प्रदेश की स्थापना से जुड़े आयोजनों में शामिल होने के लिए प्रधानमंत्री मोदी की अरुणाचल प्रदेश यात्रा का विरोध किया है। चीन का कहना है कि दोनों देशों के बीच सीमा विवाद सुलझाने के कारगर तरीकों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। प्रधानमंत्री की मई में चीन की संभावित यात्रा के ठीक पहले आयी चीन की यह आक्रामक प्रतिक्रिया दिल्ली- बीजिंग के असहज होते संबंधों की झलक है। वास्तव में ड्रैगन की विस्तारवादी सोच ने भारतीय शांतिप्रियता को हमेशा ही कमजोरी समझा है। 2011 से प्रतिवर्ष बढ़ते अस्थाई सीमा का अतिक्रमण भारत के लिए चिंता का विषय है। शायद ड्रैगन इतिहास की पुनरावृति करना चाह रहा है। इसके पहले भी चीन ने 1950-51 में अपने नक़्शे में भारत के विशाल भूभाग को अपना हिस्सा दिखाया था। 1954 में बद्रीनाथ के पास के 'बड़ा होती' को अपना इलाका बताते हुए भारतीय क्षेत्रों में लगातार घुसपैठ करता हुआ, हमारी तत्कालीन सामरिक कमजोरी तथा आर्थिक विपन्नता का फायदा उठाते हुए चीन ने 1962 में पीठ पर छूरा मारते हुए 1600 वर्गमील भूभाग पर नाजायज कब्जा जमा लिया था।
चीन ने पहले ही अक्साई चीन को रणनीतिक दृष्टि से काफी विकसित कर लिया है। 26 अक्टूबर 1947 को कश्मीर के महाराज हरि सिंह ने पूरे कश्मीर का भारत में विलय स्वीकार कर लिया था।परन्तु, कबाइलियों की मदद से अनपेक्षित आक्रमण की बदौलत पाकिस्तान ने कश्मीर के एक विस्तृत भूभाग पर अवैध कब्ज़ा कर लिया था, जिसका लगभग एक तिहाई हिस्सा 5180 वर्ग किलोमीटर भूभाग उसने मार्च, 1963 में चीन को उपहार स्वरुप दे दिया था। आज यह हिस्सा अक्साई चीन कहलाता है, जिसे भारतीय सीमा पर चीन ने महत्वपूर्ण सैन्य क्षेत्र के रूप विकसित कर लिया है। दूसरी तरफ पूरे अरुणाचल प्रदेश को दक्षिण तिब्बत का हिस्सा बताकर भारत पर लगातार दबाव बनाता रहा है। और अब उसकी टेढ़ी नजर सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश पर है।
ऐसी स्थिति में एक दृढ राजनैतिक इच्छाशक्ति के साथ ही इस क्षेत्र में उन्नत संसाधनों के तीव्र विकास से ही भारत चीन को दबाव में ला सकता है। केंद्र का भावुक राजनयिक शिष्टाचार कहीं 1962 वाली आत्मघाती भूल न करा बैठे। ड्रैगन की सर्द मुस्कुराहट के बीच बदलती उसके माथे की शिकन पर नजरें गड़ाए रखनी पड़ेंगी।
भयंकर तूफ़ान की आशंकाओं के बीच यक्षप्रश्न- क्या आत्ममुग्ध कें द्र चीन की चाल समझ पायेगा?
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