जानि परत हैं काक पिक ऋतु बसंत के मांही'
नव गति, नव लय, ताल-छंद नव
नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव;
नव नभ के नव विहग-वृंद को
नव पर, नव स्वर दे !
वर दे, वीणावादिनि वर दे।
नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव;
नव नभ के नव विहग-वृंद को
नव पर, नव स्वर दे !
वर दे, वीणावादिनि वर दे।
समष्टि में व्यष्टि को समाहित कर नए आकाश में उड़ने को पंख तौलते सारे विहगों को नई गति, नया लय-ताल, नए पर की याचना करते कवि को स्वतंत्र किन्तु मृत्यु से निर्भीक स्वर की कामना है, और हम सबको भी।अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर अग्रसर करती उस चैतन्य शक्ति के प्रसाद की कामना कर रहा भारतीय जनमानस लोकतंत्र में अपने वाग्जाल में उलझाकर अपना उल्लू सीधा करते स्वार्थसाधकों के जाल में उलझ गया है। आरोप-प्रत्यारोपों के बीच मिट गया है सच-झूठ का अंतर।
पिछले दिल्ली चुनावों में बिजली कम्पनियों में हिस्सेदारी के आरोपों के लहराते पन्ना-बम से 'दीक्षित' माता-पुत्र को नाकों चने चबवा देनेवाले 'आआप' के कर्णधारों ने इस चुनाव में वही शस्त्र प्रान्त भाजपा अध्यक्ष पर छोड़ा है। सत्ता को ही अंतिम ध्येय बना चुकी भाजपा भी कैडर के प्रति अविश्वाश जता चुकी है तथा कैडर की उपयोगिता महज़ दरियां बिछाने, कुर्सी-टेबल लगाने तक सीमित कर दी है। लूट के नव-नव प्रतिमान बनाने वाली कांग्रेस पुनर्जीवन के लिए शायद कवि की इन्ही पंक्तियों को गुनगुना रही होगी। आशा-निराशा के बीच झूलते दल, गाल बजाते दलों के चारण। ऐसे में नमक-रोटी में उलझी आम जनता के बुनियादी सवाल कही पीछे छूटते जा रहे हैं।
पिछले दस वर्षों तक जनता के माथे पर शातिराना मौन साधे नौकरशाह तांडव करता रहा। भारतीय लोकतंत्र पर अभिशाप की तरह संधानित किसी वज्र सरीखा वह अतिमानव स्वार्थान्ध धृतराष्ट्र की गद्दी के सामने सुरक्षा ढाल बना रहा, लाज जनता की लुटती रही। राजप्रासाद से अपनी रसोई तक फैले मरणांतक सन्नाटे से भयाक्रांत जनता ने अपनी समस्याओं पर बोलते नायक(?) को सिंहासन सौंप दिया। मौन की जगह प्रलाप ने ले ली। शेष वही रहा, कुछ नहीं बदला?
कहते हैं, 'जानि परत हैं काक पिक ऋतु बसंत के मांही'। इस बसन्तागमन पर कौए और कोयल के बीच का भेद कर सकें हम, वागीश्वरी से इसी विवेक की कामना के साथ ज्ञान पर्व की अशेष शुभकामनाएं।
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