Wednesday, June 25, 2014
विज्ञापन के मोह जाल में देश
एक प्रासंगिक कथा...
एक आम आदमी मरा तो उसकी आत्मा को लिए यमदूत यमराज के दरबार में लेकर पहुँचे... चित्रगुप्त ने उसके कृत्यों का ब्योरा यमराज के सम्मुख रखा। उसके कृत्यों के आधार पर यमराज ने व्यवस्था दी कि पुनर्जन्म के पहले उसे छः महीने स्वर्ग में गुजारने होंगे। यमदूत जीवात्मा को लेकर स्वर्गद्वार के पास पहुँचे। 'टूटा सा स्वर्गद्वार, उस पार भयंकर सन्नाटा..मरघट-सी शान्ति....दूर-दूर तक तथाकथित स्वर्गीय सुख की कोई झलक नहीं... संतों, ऋषियों ने शायद ही कभी स्वर्ग देखा हो...', इस प्रकार संतों, ऋषियों की बुद्धि पर तरस खाते उस जीवात्मा ने कहा कि भई, मैं जरा नर्क भी देख लूँ। यमदूत उसे नर्क की ओर ले चले। कुछ दूर जाने के बाद मधुर मोहिनी संगीत की स्वर-लहरियाँ सुनायी पड़ने लगीं। कुछ और जाने के बाद बड़े-बड़े होर्डिंग्स दिखने लगे...'आपका नर्क में स्वागत है, आइए, नर्क का पर्यटन विभाग आपका स्वागत करता है....नर्क में दम है क्योंकि यहाँ भाषणबाजी बहुत कम है।' साथ ही सुन्दर-सुन्दर अप्सराओं के मोहक चित्र आमंत्रण की मुद्रा में मन को मानों बलपूर्वक अपनी ओर खींच रहे हों। मंत्रमुग्ध-सा जीवात्मा नर्क द्वार पर पहुँचा। ...'अहा, क्या सुन्दर जगत है, दूर-दूर तक मानों हरियाली छायी हुयी है, अप्सराओं का लास्य तथा गायन...काश मैं यहीं रह पाता।' अभी जीवात्मा सोच ही रही थी कि नर्कद्वार पर स्वागताधिकारी ने उसे बढ़िया आसन पर बिछाकर लाजवाब पेय से उसका स्वागत किया तथा नर्क में कुछ दिन बिताने का आग्रह करने लगा। जीवात्मा ने यमदूतों से कहा कि भाई मैं तो छः महीने यहीं रहूँगा। आप मुझे यहीं छोड़ दें। यमदूतों ने बहुत समझाया कि आपको तो स्वर्ग में रहना है, आप यहाँ क्यों रहेंगे, पर उनकी एक न चली। अंत में उसे वहीं छोड़कर यमदूत चले गए। जीवात्मा नर्क के स्वागत-कक्ष से बाहर चली। उस पार पहुँचते ही चार भयंकर यमदूतों ने उसे थाम लिया और खौलते तेल के कड़ाह में झोंक दिया। वह चिल्लाने लगा 'यह तो धोखा है। बाहर तो यह सब नहीं था..'मुर्ख, वह नर्क का विज्ञापन विभाग था।'
महँगाई की नई भट्ठी में पकाया जाता आज सोचने को विवश हूँ कि कहीं देश की आम जनता भी तो नर्क के विज्ञापन विभाग की जादुगरी में तो नहीं फँस गई.......
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