Wednesday, January 28, 2015

'ऐसे जियो कि परदा गिरने के बाद भी तालियां बजती रहे

जम्मू कश्मीर के पुलवामा में आतंकियों के साथ चली मुठभेड़ में आतंकियों का सामना करते हुए भारतीय शौर्य के प्रतीक कमांडिंग ऑफिसर कर्नल एम एन राय तथा जम्मू-कश्मीर के हेड कांस्टेबल संजीव सिंह शहीद हो गये. राष्ट्रपति पदक प्राप्त कर्नल और जांबाज संजीव सिंह की शहादत पर शोकाकुल राष्ट्र मानों एक दिन पहले के गणतंत्र दिवस परेड पर भारतीय शौर्य प्रदर्शन की प्रासंगिकता तलाश रहा  है
कब तक सुलगती रहेगी सीमा? आखिर सीमा पार से आनेवाले आतंक के घुसपैठियों तथा घर में छुपे गद्दारों की तलाश में कब तक हमारे वीर रक्षक अपना अकारण बलिदान देते रहेंगे? क्या दुश्मनों को उसी की भाषा में जबाब देने को उद्धत 56 इंच का सीना ताने नायक की मुद्रा महज़ वोट की याचना करते किसी कुटिल राजनीतिज्ञ का ढोंग थी? गणतंत्र दिवस पर 'अमेरिका से  आया मेरा दोस्त' की बीन पर थिरकता शासक वर्ग क्या अमर जवानों की इस क्लैव्ययुक्त ह्त्या पर आहत है
सच ही कहा है राष्ट्रकवि ने.…… 
वह कौन रोता है वहां, इतिहास के अध्याय पर, 
जिसमें लिखा नौजवानों के लहू का मोल है,
प्रत्यय किसी बूढ़े, कुटिल नीतिज्ञ के व्यवहार का, 
जिसका हृदय इतना मलिन, तना कि शीर्ष वलक्ष है
जो आप तो लड़ता नहीं कटवा किशोरों को मगर 
आश्वस्त होकर सोचता शोणित बहा 
लेकिन बच गई लाज सारे देश की.. 
जबसे नयी सरकार ने सत्ता सम्हाली है, चीन तथा पाक सीमाओं पर मानों घुसपैठ और आतंकी वारदातों की बाढ़-सी आ गयी दिख रही है। हर बार हम सीमा की ओर मुंह कर ' बस अंतिम बार, फिर हुआ तो सोच लो.… ' की तर्ज़ पर गुर्रा उठते हैं. हमारे सत्तानायकों की 'फटा पोस्टर…… ' वाली भंगिमा मानों उन्हें और उकसा देती हैं. फिर वही घटनाएं और सत्ताशीर्ष का बेशर्मों की तरह फिर से वही रिस्पॉन्स. अपनी क्लीवता और गाल फुलाने में निपुण हुक्मरानों को कठिन और दुर्गम सीमा की रक्षा को सन्नद्ध शूरमाओं को अनुकूल न्यूनतम उपकरण सुलभ कराना तो दूर की बात, उस पर सोचने की भी फुर्सत मिलती नहीं दिख रही. सत्ता हथियाने के आठ महीने बाद भी इलेक्शन मोड में अटकी मोदी सरकार जो गंभीरता और जितना रणकौशल दिल्ली-विजय के लिए दिखला रही है, क्या सीमा शांत करने को उतनी गंभीर कभी दिखी है? अगर दिखी होती तो 185 करोड़ की आबादी में करोड़ों भूखे-नंगों के देश का निर्वाचित प्रतिनिधि इन आठ महीनों में आठ सौ डिजायनर पोशाकें बदल-बदलकर अपनी वैचारिक नग्नता ढंकने का प्रयास करता नहीं दिखता.            
साबरमती के अधनंगे फ़कीर का तथाकथित उत्तराधिकारी  और सरदार पटेल को अपना आदर्श बताने वाले सत्ताशीर्ष को यदि आईने के सामने खड़े होकर स्वयं को आत्ममुग्ध देखने से फुर्सत मिलती तो देख पाता कि देश आज कितना शर्मिन्दा है. 
मर्माहत देश दुविधा में है कि अमर शहीदों के उत्कट बलिदान पर अभिमान करें या शेर की खाल ओढ़े धूर्त सियारों को सत्ता सौंपने पर लज्जित हों.  


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