Saturday, August 20, 2011

मैं अन्ना हजारे क्यों हूँ


16 अगस्त 2011 को अन्ना के अनशन शुरू करते ही कांग्रेसी खेमा किस कदर बौखलाया हुआ है, यह उसके औपचारिक प्रवक्ताओं और अनौपचारिक लिक्खाड़ों की भाव-भंगिमा और भाषा से साफ झलक रहा है। कांग्रेसी प्रवक्ता प्रेस-कांफ्रेंस करता है और खारिज हो चुके आयोग की रपट दिखाकर फिल्मी गली के गुण्डों की तरह चीखता है,-बाबू किशनराव हजारे उर्फ अन्ना, तुम किस मुँह से भ्रष्टाचार की विरोध की बात करते हो, जबकि तुम खुद सिर से पाँव तक भ्रष्टाचार में लिप्त हो। वह सत्ता के नशे में या चाटुकारिता के अतिरेक में (जिसके दम पर वह इतने कम समय में इतनी बड़ी राजनैतिक पार्टी का प्रवक्ता बन बैठा है) यह भूल जाता है कि उसकी पिता की उम्र के निष्कलंक अन्ना आज सम्पूर्ण देश के आदर्श हैं। एक अन्य प्रवक्ता अमेरिका पर ओसामाजी (?) की नृशंस हत्या (?) से इस कदर बौखलाया हुआ है कि इस सरकार की सर्वओर विफलता से उठे जनाक्रोश की आँधी में अमेरिका का हाथ देखने लगता है। धर्म-जाति-भाषा-प्रान्त के आग्रहों से ऊपर उठकर गाँव की गलियों और शहरों की परिधि से निकलकर आकाश भेदते भारत माता का जयघोष करती जनता का आदर्श पुरुष इन्हें कभी साम्प्रदायिक ताकतों का मुखौटा लगता है तो कभी अमेरिका का मुहरा। और मजे की बात तो यह है कि बावजूद सारे विरोधों के, देश की सम्प्रभुता की कीमत पर इसी अमेरिका से एटमी-सन्धि के समर्थन के लिए तीन दुर्दान्त सजायाफ्ता सांसदों को संसद में बैठने की अनुमति दे दी गई थी। जनता के मताधिकार का इससे बड़ा उपहास क्या हो सकता है ?

इसी लहजे में एक दैनिक समाचार पत्र के एडीटर एट लार्ज ने अचानक अकुलाकर एक लेख अपने अखबार में लिख मारा है— मैं अन्ना हजारे क्यों नहीं हूँ। उच्च पदासीन एडीटर एट लार्ज को अन्ना का आन्दोलन केवल मध्य वर्ग का पाखण्ड नजर आता है , जो उनके अनुसार भ्रष्टाचार से ज्यादा कई गम्भीर मुद्दों पर कभी सामने नहीं आता। वह कहते हैं कि, मैं आपको यह बता दूं कि मैं गांधी टोपी लगाकर, मोमबत्ती जलाकर आजादी के दूसरे आंदोलन में शामिल नहीं होने जा रहा। मैं आपको बताना चाहता हूँ कि मैं अन्ना हजारे क्यों नहीं बनना चाहता। यह विरोध आंदोलन है, कोई क्रांति नहीं। मुझे इसकी भावनाओं में मध्य वर्ग का एक पाखंड दिखाई देता है।

श्री समर हलर्नकर स्वज्ञानातिरेक में शायद यह भूल गए कि भारत की आजादी की लड़ाई में वह मध्य वर्ग का भावुक जनमानस ही था जिसने ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज अस्त कर दिया था। रॉलेट ऐक्ट और साइमन कमीशन के विरोध का आन्दोलन ही स्वराज्य-क्रान्ति की आधार-भूमि थी। फाँसी के फन्दों की ओर बढ़ते भावुक बिस्मिल हों, भगत सिंह हों अथवा अशफाक हों— भावुक मन का समवेत उभार ही क्रान्ति का जनक होता है। वैसे भी तथाकथित सर्वज्ञानियों की तरह ही उत्साह के अतिरेक में श्री हलर्नकर यह देखने का कष्ट भी नहीं करते कि वनाञ्चलों से भी वही जनघोष सुनायी पड़ रहा है, जो मेट्रोपोलिटन शहरों से। मध्यप्रदेश में बैतूल जिला मुख्यालय से पचास कि.मी. दूर अमर शहीद विष्णुसिंह गौड़ की धरती के वनवासी श्री बलवन्त परते के साथ रणघोष कर रहे हैं- हम संकल्प लेते हैं कि हम न तो रिश्वत लेंगे, न ही रिश्वत देंगे। श्री हलर्नकर, क्या अन्ना के सत्याग्रह का यह दिव्य प्रभाव भी आपकी समझ(?) में भावना का पाखण्ड है?

आप गाँधी टोपी लगाकर, आजादी के दूसरे आंदोलन में शामिल नहीं होने जा रहे, जा भी नहीं सकते। आपसे पहले भी इस आन्दोलन से जुड़ने के एक मान्य न्यायाधीश के आग्रह का देश के एक सांसद ने वंशतन्त्र के सम्पूर्ण अहंकार से उत्तर दिया था, मुझे नेता बनने का कोई शौक नहीं है। और इस शालीनता(?) पर सम्पूर्ण कांग्रेसी कुनबा मुग्ध हो उठा था। जिन कांग्रेसियों को अपनी नौकरियों से एक दिन का अवकाश लेकर आन्दोलन से जुड़ने का अन्ना का आह्वान कानून और संविधान के लिये घातक दिख रहा था, वही गदगदाया कुनबा किसानों की राख से भट्टा-पारसौल पट गया है, औरतों से बलात्कार हुआ है की झूठी अफवाहें फैलाकर कार्यपालिका के साथ ही न्यायपालिका को भ्रमित करने की चेष्टा करते सांसद की घृणित और दण्डनीय हरकत को बाललीला समझ पुलकित हो रहा था। यूपी में पुलिस बर्बरता देख अपने को भारतीय कहने में शर्माने वाले स्वयंभू कर्णधार दिल्ली में आधी रात के बाद पुलिस की रावणलीला पर चुप रहें तो देश मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना, अब तो सारा देश है अन्ना की ताल पर थिरकेगा ही। जब देश यह देखेगा कि भोपाल के भीषण नरसंहार का अपराधी आसानी से देश से चला जाता है और विदेश मन्त्रालय सम्हालते तत्कालीन प्रधानमन्त्री और उनके वारिस सफाई से अपना पल्ला झाड़ लेते हैं या जब किसी क्वात्रोची की रक्षा को कोई अदृष्य हाथ अचानक सीबीआई पर अंकुश बन जाता है और हम क्या करें कि मासूमियत(?) फिजा में तैर जाती है तब जनलोकपाल के रूप में एक और निष्पक्ष तथा स्वतन्त्र लोकतान्त्रिक स्तम्भ की माँग उठेगी ही। जब कुर्सी के खेल में सत्ता के दलाल सूटकेसों में नोट भरकर सांसदों को खरीद लेते हैं, जब देश के प्रधानमन्त्री हर घोटाले के पकड़े जाने पर झूठी मासूमियत का लबादा ओढ़े मेरी जानकारी में नहीं था, यह गठबन्धन धर्म की मजबूरी थी, गठबन्धन के अन्य घटकों की जवाबदेही मुझपर नहीं है, मेरे पास जादू की छड़ी नहीं है जैसे अनर्गल प्रलाप कर रहे हों तब देश की जनता प्रधानमन्त्री को स्वतन्त्र लोकपाल के दायरे में देखना चाहेगी ही।

बिहार में पशुओं तक का चारा चट्ट कर जाने वाले, लोकशाही की गलत व्याख्या कर केन्द्र की शह पर झारखण्ड की आनेवाली सात पीढ़ियों तक का खुराक हजम कर जाने वाले, महाराष्ट्र में आदर्श स्थापित करने वाले, टूजी, कॉमनवेल्थ जैसे घोटालों के सहारे जनता की गाढ़ी कमाई लूट लेने वाले माननीय(?) वर्तमान व्यवस्था की खामियों का चतुराई से फायदा उठा लेते हों या हत्या, बलात्कार, अपहरण, सांप्रदायिक दंगों जैसे घृणित अपराधों में लिप्त लोग व्यवस्था का फायदा उठा संसद / विधानसभाओं में पहुँचकर शासक बन जा रहे हों और वर्तमान व्यवस्था इन्हें रोक नहीं पा रही हो तो व्यवस्था-परिवर्तन की माँग उठेगी ही।

तथाकथित आर्थिक विकास के नाम पर अपने घरों से विस्थापित आश्रयहीन देशवासी दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। उनके पुनर्वास के नाम पर सत्ताधारियों द्वारा जनता की सम्पत्ति का बन्दरबाँट अथवा विरोधी सरकार को घेरना सांसदों / विधायकों का पसंदीदा काम है। जनहित के मामलों को संसद में उठाने के लिए रूपये लेना, एक-दूसरों को नीचा दिखाने के लिए संसद को ठप्प कर देना, सत्र में सोना या अनुपस्थित रहना अथवा गाली-गलौज से जूतम-पैजार तक के लिए आमादा रहना और इन सबके बीच यह भूल जाना कि आप जनता के प्रतिनिधि हो— ऐसे अपराधों को रोकने, इनकी जाँच करने और अपराध सिद्ध होने पर इसके लिए इन्हें कठोरतम दण्ड देने की अनुशंसा करने के लिए क्या कोई स्वतन्त्र लोकतान्त्रिक संस्थान नहीं होना चाहिये? क्योंकि एक तो अबतक की व्यवस्था में कई छिद्र हैं जिनके कारण आज तक घोटालों के लिए कोई माननीय न तो दण्डित हुआ है और न ही घोटाले के करोड़ों रूपये इनसे निकाले जा सके हैं और दूसरे, परोक्ष रूप में अपने मामलों के लिए ये स्वयम् ही न्यायाधीश नहीं बनाए जा सकते। सीवीसी / पीएसी की विपरीत रपट आयी तो सत्ता-पक्ष — सीबीआई ने जाँच शुरू कर दी तो विपक्ष हाय तौबा मचाने लगता है। वैसे भी सीबीआई जैसी सरकारी जाँच एजेन्सियों की विश्वसनीयता संदिग्ध हो चली है। सरकार इसका इस्तेमाल या तो विरोध करने वालों को ब्लैकमेल करने के लिए करती है या उन्हें तबाह करने की नीयत से( जैसा कि अभी-अभी आचार्य रामदेव, उनके सहयोगी आचार्य बालकृष्ण, जगन रेड्डी आदि के संदर्भ में देखते हैं।) जैसे ही विरोधियों को मनाने की कवायद फेल होती है, अचानक ये एजेन्सियाँ सक्रिय हो उठती हैं। तब सत्ता-पक्ष बड़ी शान से खुली धमकी देता है— आपके पास पुलिस है तो हमारे पास सीबीआई। मजबूरन माननीय उच्चतम न्यायालय को जाँच की मॉनिटरिंग का अतिरिक्त भार उठाना पड़ता है, ताकि जाँच निष्पक्ष और बिना किसी दबाव के पूरी हो सके।

आज अन्ना के नेतृत्व में देश एक निष्पक्ष तथा स्वतन्त्र मॉनिटरिंग एजेन्सी चाहता है जो ख़ुद किसी भी मामले की जांच शुरु करने का अधिकार रखता हो। इसमें किसी से जांच के लिए अनुमति लेने की ज़रूरत नहीं हो। जो केवल परामर्श न दे बल्कि जिसके पास किसी भी सरकारी अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई की क्षमता होगी। जिसको नियुक्त करने वाली समिति में उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, दोनो सदनों के नेता, दोनो सदनों के विपक्ष के नेता, क़ानून और गृह मंत्री नहीं, अपितु न्यायिक क्षेत्र के लोग, मुख्य चुनाव आयुक्त, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, भारतीय मूल के नोबेल और मैगासेसे पुरस्कार के विजेता जैसे जनता के नुमाइंदे हों। जो भ्रष्टाचार की जाँच एक साल में पूरी करे और उसके एक साल में अदालती कार्यवाही पूरी कर घोटाले की रकम वसूल कर सके।

अब कुछ लोग इसे संसद की सर्वोच्चता पर संकट मानते हों तो उन्हें जानना चाहिये कि हमारा संविधान प्रजातन्त्र में जनता को सर्वोच्च मानता है। शेष सारी संस्थाएँ उसके हित का साधन मात्र हैं। और जनता कह रही है,-

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है

वैसे भी संसद सर्वोच्च है, सांसद नहीं। यदि जनता की सम्पत्ति के लुटेरे अपने तिकड़मों अथवा विधान के छिद्रों का लाभ लेकर विधायिका और कार्यपालिका में पहुँच जाएँ तो लोकतन्त्र की रक्षा को

मैं भी अन्ना, तुम भी अन्ना, अब तो सारा देश है अन्ना

1 comment:

  1. जिसका जैसा चश्मा होगा दुनिया उसे वैसी ही दिखाई देगी.. अगर जनआंदोलन में भी कोई धर्म, जाति, राजनीति और वर्ग विभाजन खोज लेता है तो ये ढूंढने वाले की आंखों का दोष है..आंदोलन का नहीं... आंदोलन और आंदोलनकारियों को अपना साध्य दिख रहा है... और लोकतंत्र की रक्षा के लिए वे उसे हासिल करके रहेंगे..क्योंकि जनता कह रही है सिंहासन खाली करों कि जनता आती है....

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