जल-संरक्षण को दैनन्दिन व्यवहार बदलें, त्योहार नहीं
अभिमान करने योग्य हमारी
शानदार परम्परा के माथे की रोली.... लो आ गयी हमारी चिरप्रतीक्षित रंगों भरी होली.....इस अवसर पर कुछ तथाकथित नामछपासी
खोजियों को दुनिया के कुछ त्योहारों को हमारी होली के समकक्ष बतलाने में आत्मगौरव
का बोध हो रहा है तो कुछ ‘परोपदेशे पाण्डित्य’ वाले छपासी इस अवसर पर स्वयम् को महामानव सिद्ध करने पर तुले हैं। विकसित देशों का जो स्वभाव है कि वे अपनी जरूरत के लायक 80-85% उर्जा का उपभोग करना कम नहीं करते
किन्तु उर्जा-स्रोतों के खत्म होने का डर दिखाकर दूसरी-तीसरी दुनिया को उर्जा के
किफायती प्रयोग की नसीहत दे बैठते हैं। ठीक उसी प्रकार धनोन्मत्तों के प्रतिनिधि
बने कुछ मीडिया-भड़ासी तू कौन मैं खामख्वाह की तर्ज पर पानी की मितव्ययिता का पाठ
पढ़ाने लगते हैं। एक बानगी
देखिए....
"हम सब जानते
हैं कि महाराष्ट्र सहित देश के कुछ हिस्से इस समय घनघोर सूखे की आपदा से जूझ रहे हैं। सूखा सिर्फ कुछ किसानों की किस्मत पर ही बर्बादी की
दास्तां नहीं लिखता, बल्कि एक संदेश भी देता है कि हमारी धरती के नीचे जमा जल सूख रहा है। तालाब भरते नहीं, सदानीराओं का जल कम हो गया है और कुओं की तली
ऊपर से साफ दिखने लगी है। हम एक प्यासे और अतृप्त भविष्य की ओर बढ़ रहे
हैं। ऐसे में आशंका की काली परछाइयों से लड़ने के लिए यकीनन हमें अपने अंदर
बदलाव लाना होगा। हमारे त्योहार हमेशा परिवर्तन के प्रतीक रहे हैं।
क्यों न इस होली हम खुद को बदलें और पास-पड़ोस के लोगों को पानी के कम-से-कम दुरुपयोग की सलाह दें?"( दैनिक ‘हिन्दुस्तान’ के 24
मार्च 2013 के अंक में शशिशेखर)
अचानक बड़ी भावुक हो उठे हैं बरसाती कुकुरमुत्तों की तरह उग आए ‘कुपथ-कुपथ रथ दौड़ाता जो..’ टाइप पथनिर्देशक। इतने वर्षों में 25 दिसम्बर को जलने वाली मोमबत्तियों और पटाखों पर प्रदूषण का कभी खयाल नहीं आया, गंगा-यमुना में गिरने वालीं कसाईखानों में कटते मवेशियों के खून की नदियाँ कभी इनको आन्दोलित-करुणाविगलित नहीं करतीं, यहाँ नई दिल्ली में आँख के नीचे यमुना में गिरते बजबजाते सीवर तथा हजारों कारखानों के रासायनिक मलबों वाले नालों पर इन श्रीमान सर्वज्ञानियों की लेखनी शायद ही मचली हो, लेकिन बदरंग और बदमजा करने के लिए कलम सर्र-सर्र चल निकलती है..... ‘जो लिख दो कूड़ा-कर्कट छप जाएगा....अपना ही है प्रेस काम कब आएगा’।
अचानक बड़ी भावुक हो उठे हैं बरसाती कुकुरमुत्तों की तरह उग आए ‘कुपथ-कुपथ रथ दौड़ाता जो..’ टाइप पथनिर्देशक। इतने वर्षों में 25 दिसम्बर को जलने वाली मोमबत्तियों और पटाखों पर प्रदूषण का कभी खयाल नहीं आया, गंगा-यमुना में गिरने वालीं कसाईखानों में कटते मवेशियों के खून की नदियाँ कभी इनको आन्दोलित-करुणाविगलित नहीं करतीं, यहाँ नई दिल्ली में आँख के नीचे यमुना में गिरते बजबजाते सीवर तथा हजारों कारखानों के रासायनिक मलबों वाले नालों पर इन श्रीमान सर्वज्ञानियों की लेखनी शायद ही मचली हो, लेकिन बदरंग और बदमजा करने के लिए कलम सर्र-सर्र चल निकलती है..... ‘जो लिख दो कूड़ा-कर्कट छप जाएगा....अपना ही है प्रेस काम कब आएगा’।
महामानव दिखने की होड़ में भूल जाते हैं कि यदि वे धनपशुओं को
प्रतिदिन कुत्ते नहलाने-चराने में, लॉन्स सींचने
में तथा 10-12 महँगी कारें धोने में पानी
बरबाद न करने का उपदेश दे सकें, फैक्ट्रीज में पानी के
किफायती प्रयोग करने
तथा फैक्ट्रीज का प्रदूषित पानी अपनी सदानीराओं
में नहीं डालने को मना सकें तो हमारी होली बदमजा न होगी।
अरे यदि ऐसे लक्ष्मीवाहन स्वयं अपनी कार एक दिन न धोते तथा अपने लॉन-गमलों में पानी डालना
बन्द कर देते तो भी महाराष्ट्र की यह स्थिति न होती।
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