“ऐसे समय जबकि हिन्दू समाज अपने धर्म,संस्कृति,स्वावलम्बन,आत्मविश्वास आदि के प्रति पूर्णतः निराश होकर अपने को निर्बल और असहाय मानकर डाँवाडोल स्थिति में था, तब तुलसीदासजी ने ‘निर्बल के बल राम’ का मंत्र फूँककर उसमें नवजीवन का संचार किया। उन्होंने श्रीरामचरितमानस रचा और सभी समस्याओं का एकसाथ समाधान कर दिया”। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की इन पंक्तियों में महाकवि तुलसीदास की महानता का समस्त अर्थ छिपा है। महाकवि गोस्वामी तुलसीदास की लेखनी ने वह कार्य कर दिखाया जो आज तक किसी कवि ने नहीं किया। तत्कालीन हिन्दू समाज पूरी तरह हताश हो चुका था। योगियों, तांत्रिकों, महन्तों, मठाधीशों ने उसे नाना भाँति नचाया और फँसाया था। कोई तीर्थ, व्रत, उपवास आदि का खंडन करके निराकार की उपासना का ज्ञान दे रहा था, किसी ने उसे पिंड में ही ब्रह्मांड और ब्रह्म को खोजने की सलाह दी तो कोई योग के चमत्कार का गान कर रहा था। जनता ने सबको सुना, सबका पालन किया किन्तु हताश देखती रही कि मंदिर टूट रहे हैं, मठ ढहाये जा रहे हैं, योगी खदेड़े जा रहे हैं और सारे साधन काम नहीं आ रहे हैं। हताश समाज मन ही मन उस अव्यक्त को पुकारने लगा था जो गीध को, शबरी को, केवट को, पत्थर बनी अहल्या को--समाज के हर पीड़ित, दलित और उपेक्षित वर्ग को अपनी करुणा से सराबोर कर सके, जो राष्ट्र-यज्ञ में लीन ऋषियों को अपने धनुष की छाया दे सके और आश्वस्ति देते हुए कहे,--
‘निर्भय यज्ञ करहु तुम्ह साईं’
इस भयानक हताशा में आर्तनाद करती जनता को अत्याचार और अनाचार के विरुद्ध खड़े नीलोत्पल घनश्याम,रणरंगधीर, लोकरंजक,लोकाश्रय राम की अभयदायिनी घोषणा--
‘निसिचर हीन करौं मही’..
महाकवि के स्वर में गूँज उठी। जनता को अवलम्ब मिल गया और ग्रीयर्सन को भगवान बुद्ध के बाद भारत का लोकनायक।
गोस्वामीजी की महानता का एक पक्ष यह है कि आजीवन तिरस्कार सहकर भी मर्यादा का आदर्श ओझल नहीं होने दिया। बांदा जिले के राजापुर गाँव में सम्वत् 1554 की श्रावण शुक्ल सप्तमी को अभुक्तमूल में जन्मे अनाथ रामबोला को मुनिया दाई और उसके बाद उसकी सास परबतिया ने अकाल काल-कवलित होने से बचाया था। बाल्यावस्था दुत्कार और घोर विपन्नता में बीती। रामबोला की बाल्यावस्था की करुणगाथा इन पंक्तियों में सिमट गयी है,
‘मातु पिता जग जाय तज्यौ, विधिहू न लिखी भाल भलाई’
‘तनु तज्यौ कुटिल कीट ज्यों, त्यौं तज्यौ मातु पिताहू’
‘बारे ते ललात बिललात द्वार द्वार दीन,जानत हौं चार फल चार ही चनक को’
भिखारियों से जूठन के लिये भी दुत्कारे जाते रामबोला को बाबा नरहरिदास ने तुलसी नाम दिया और काशी ले आए। सम्वत् 1561 की माघ शुक्ल पंचमी को यज्ञोपवीत संस्कार हुआ। आचार्य शेष सनातन के आश्रम में शिक्षा पूरी की। ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी, सम्वत् 1583 में रत्नावली के साथ विवाह हुआ। अपनेपन और प्रेम के लिये तरसते तुलसी का अतिशय प्यार पत्नी के उपालम्भ का कारण बन गया—
“लाज न आवत आपको दौरे आयहु साथ
धिक धिक ऐसे प्रेम को कहा कहौं मैं नाथ
अस्थि चर्ममय देह मम ता मैं ऐसी प्रीती
तैसी जो श्रीराम मँह होत न तौ भवभीती”।
और फिर घर-पत्नी-पुत्र को त्याग बुद्ध की तरह ही शुरु होती है लोकनायक की समन्वयकारी लोकमंगल-साधना। रामतत्व की खोजयात्रा शुरु हो गई। लोकरंजन में बाधक थी संस्कृत, अतः तमाम विरोधों के बावजूद लोकनायक ने लोकभाषा को स्वीकार किया। अयोध्या में संवत् 1631 को श्रीरामनवमी के दिन बह निकली श्रीरामकथा मंदाकिनी—
‘जब तें रामु ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए।’
दो वर्ष,सात महीने और छब्बीस दिनों में श्रीरामविवाह से शुरू हुई मर्यादापुरुषोत्तम की कीर्ति-गाथा श्रीरामविवाह के ही दिन संवत् 1633 को स्वान्तःसुखाय भाषा निबद्ध हो गई। जीवन के अंतिम क्षणों (श्रावण शुक्ल सप्तमी संवत् 1680) तक लोक-कल्याण की भावना का संवेदना के रुप में प्रकटीकरण, जो हृदयवाद की सर्वश्रेष्ठ विशेषता है, को तुलसी की रचना में सर्वत्र देखा जा सकता है। तुलसी के राम, जन के कष्ट देख रो पड़ते हैं, उनकी आँखों से आँसू छलकने लगते हैं। दूसरों के कष्टों से विगलित हो उठने वाले श्रीराम की गाथा भाषा में वही गा सकता था जो अतिवादी दृष्टि का परित्याग कर समस्त विरोधी तत्वों तथा गतिरोधों के कारणों का परिष्कार कर समाज में सहयोग और एकता की भावना उत्पन्न कर सकता था, जो लोक के हित में एक समन्वयात्मक दृष्टिकोण को स्वीकार करता हो। और इस अर्थ में गोस्वामीजी का कोई सानी नहीं। मूर्तिमान भक्ति के स्वरूप हैं गोस्वामीजी,--
“तुलसी जिनके मुखन ते धोखेउ निकसत राम,
तिनके पग की पानही मेरे तन की चाम”
शैवों-वैष्णवों के विवाद का निदान स्वयं श्रीरामप्रभु के मुख से कर दिया है,
‘शिवद्रोही मम दास कहावा। सो नर सपनेहु मोहि न भावा।।’
अगुण-सगुण का समन्वय करती पंक्ति—
‘सगुनहि अगुनहि नहि कछु भेदा’
भक्ति तथा ज्ञान में कौन श्रेष्ठ है, इसका उत्तर इस चौपाई में मिल जाता है—
‘ज्ञानहि भक्तिहि नहि कछु भेदा। उभय हरहि भव सम्भव खेदा।।’
तत्कालीन साहित्य में प्रचलित दोनों भाषाओं,- ब्रज और अवधी- का प्रयोग और लोकसाहित्य की सभी शैलियों का समन्वय उनकी कीर्तिगाथा कह रहा है। महाकवि ने अपने काव्य में विश्व-व्याप्त मानव धर्म और परमोदार भावनाओं को मार्मिक रीति तथा रोचकता से उभारा है किन्तु मर्यादा का अतिरेक कहीं नहीं किया है। शिव-विवाह का प्रसंग हो,
‘जगत मातु पितु संभु भवानी। तेहिं सिंगारु न कहउँ बखानी।।’,
या श्रीराम-विवाह का,--
‘सिय सोभा नहिं जाइ बखानी। जगदम्बिका रुप गुन खानी।।’
गोस्वामीजी ने कहीं भी मर्यादा का अतिक्रमण नहीं होने दिया है। तुलसी के लिये लोककल्याण ही आत्मकल्याण है। भक्ति जहां आत्मकल्याण का मार्ग खोलती है वहीं लोककल्याण का मार्ग भी प्रशस्त करती है। उनकी भक्ति में आत्मकल्याण और लोककल्याण दोनों का समन्वय है। वास्तव में लोककल्याण तभी सम्भव है जब व्यक्ति का कल्याण हो। लोक अंततः व्यष्टि का ही समष्टि रुप है। इस अर्थ में तुलसी की व्यक्ति-साधना लोकसाधना का ही रूप है। धर्म, राजनीति, साहित्य सबकी एकमात्र कसौटी है- लोकहित। यह तुलसी के लोकवादी रूप की पहचान है। राम इस लोकहित के संघर्ष में तुलसी की आत्मशक्ति के प्रतीक हैं। जब शासकों द्वारा सतत शोषित और दुर्भिक्ष की ज्वाला से दग्ध प्रजा की आर्थिक और सामाजिक स्थिति किंकर्त्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में पहुंच गई—
खेती न किसान को, भिखारी को न भीख,
बलि,वनिक बनिज को न, चाकर को चाकरी।
जीविका विहीन लोग सीद्यमान सोच बस,
कहैं एक एकन सों कहाँ जाई, का करी ।।
तब लोकरंजक आदर्श उद्घाटित हो उठता है,--
‘जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृप अवसि नरक अधिकारी।।’
समकालीन कृष्णभक्त कवियों की तरह जन-विच्छेद की ऐकान्तिक साधना से परे और निर्गुणियों की पहेलीपूर्ण दुरूह हो गई भाषा से हटकर श्रीराम के आदर्श का गान कोरा भजन नहीं, भाव की पराकाष्ठा है। प्रोफेसर बड़थ्वाल के शब्दों में “मानव प्रकृति के क्षेत्र में जो उपासना है, अभिव्यंजना के क्षेत्र में वही साहित्यिक हो जाता है। गोस्वामीजी ने सूर, जायसी और कबीर की पँक्तियों को समेट कर अपनी कला के लिए न केवल भारतीय इतिहास का सर्वोत्तम कथानक ही चुना वरन उसकी लपेट के साथ ही काव्य के कमनीय कोमल कलित कलेवर की माधुरी से सभी को मुग्ध कर दिया, परंतु साथ ही अपने वर्ण्य-विषय आध्यात्मिक तत्व की प्रधानता को कभी शिथिलता नहीं दी।”
लोकनायक का यह आदर्श काशी में फैले प्लेग में कर्मरूप में सामने आता है। उनके द्वारा स्थापित अखाड़ों के शताधिक युवक उनके नेतृत्व में प्लेग को परास्त करने में जुट गये। कोरा आदर्श नहीं, आदर्श का क्रियमाण उदाहरण बन गया महाकवि का जीवन। तभी तो तुलसीदास का काव्य, लोक-संस्कृति का अभिन्न अंग बन गया है। स्वान्तः सुखाय लिखी रघुनाथ गाथा हर व्यक्ति का कण्ठहार बन गई है। हिन्दू समाज के लिए धर्म ग्रन्थ, नीति ग्रन्थ, काव्य ग्रंथ यदि कोई है तो श्रीरामचरितमानस है। रहीम के शब्दों में कहें तो,
“रामचरितमानस विमल, संतन जीवन प्रान।
हिन्दुआन को वेद सम, यवनहि प्रगट कुरान।।”
और हो भी क्यों न, बाबा के सामने काव्यादर्श आइने के समान स्पष्ट है--
'कीरति, भनित, भूति भलि सोई,
सुरसरि सम सब कर हित होई।'
(कविता,कीर्ति और धन-सम्पदा तभी अच्छी है जब गंगाजी के समान उससे सबका भला हो)। इसीलिये तो मधुसूदन सरस्वती बोल पड़ते हैं,
"आनन्दकानने हि अस्मिन् जंगमः तुलसीतरुः,
कवितामंजरी भाति रामभ्रमर भूषिता।"
"इस आनन्दकानन में चलते-फिरते तुलसी-तरु की कविता-मंजरी पर रामरुपी भौंरा सदा मंडराया करता है।"
जिन्हें कृत्रिमता छू भी नहीं पाई है, जिनकी व्यापकता का रहस्य स्वयम् की अनुभूति की सत्यता तथा स्पष्टता में छिपा है, उन महान् लोकनायक को शतशः नमन।
शील भूषण शर्मा,
अतिसुंदर...अद्भुत....ज्ञानमय। भक्ति और व्यवहार से परिपूर्ण ऐसे लेखों की ब्लॉग पर काफी जरुरत है। ऐ लेख वैसे लोगों के लिए प्रेरक बन सकता है जो ज्ञान के आभाव में अपनी संस्कृति, धर्म और मर्यादा को कोसते हैं।
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