Saturday, July 9, 2011

‘चना, चबैना, गंगजल जो पुरवै करतार’



बीरन भइया अइले अनवइया
सवनवा में ना जइबे ननदी।

रिमझिम पड़ेला फुहार
बदरिया आई गइले ननदी।।

सावन का मतवाला मौसम और गूँजते कजरी के बोल---- एक ओर काशी हर हर महादेवके महोच्चार से शिवप्रिय सावन के अभिनन्दन को उत्सुक है तो दूसरी ओर बनारस सावन के स्वागत में कजरी की धुन पर थिरकने को अधीर। वैसे तो शब्दकोश में काशी और बनारस समानार्थी हैं, किन्तु मोक्षदायिनी काशी का स्मरण जहाँ वैराग्य-बोध कराता है वहीं बनारस उमंग और उत्साह से भरपूर, मस्ती में अलसाये अल्हड़ जीवन का पर्याय है।

बात सावन में मस्त कर देने वाली कजरी की हो रही हो तो आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का एक प्रसंग याद आ जाता है। एक बार रामचन्द्र शुक्ल इक्के पर सवार दुर्गाकुंड की ओर से आ रहे थे। रास्ते में किसी रईस के यहाँ काशीबाई का गाना हो रहा था, जो सड़क तक सुनाई पड़ रहा था। शुक्ल जी ने अपने मित्रों से कहा –जिसका बिरहा इतना मीठा है, उसका मिलन कितना सुखद होगा
राग-विराग, परम्परा-आधुनिकता तथा आध्यात्मिकता-लौकिकता जैसे विरोधी भावों से भरा बनारस मात्र एक शहर नहीं बल्कि सम्पूर्ण जीवन-दर्शन है और सावन इसका उद्गाता। इसीलिये तो सावन के शिवमय हो चुके माहौल में पंचकोशी यात्रा भी मस्ती में सराबोर रहती है। पाँच दिनों तक चलने वाली पंचकोशी यात्रा 25 कोस या 75 किमी की होती है। प्रतिदिन पाँच कोस पैदल चलने के बाद एक पड़ाव होता है। वैसे पाँच पड़ावों वाली यह यात्रा साल भर चलती है, पर सावन में इसका जवाब नहीं। हर पड़ाव लगता है मानों लोग पिकनिक मनाने को एकत्र हैं। श्रद्धा और मस्ती के दो समानान्तर पाटों के बीच पंचकोशी मणिकर्णिका घाट से शुरू होती है। श्रद्धालु कर्दमेश्वर, भीमचंडी, रामेश्वर, शिवपुर और कपिलधारा होते हुए पूरी काशी की परिक्रमा कर वापस मणिकर्णिका पहुंचते हैं।

एक बार पुराणों और महाभारत के रचयिता भगवान वेदव्यास अपने शिष्यों के साथ काशी-वास की इच्छा से यहाँ आए। माता अन्नपूर्णा की ऐसी माया हुयी कि तीन दिन तक उन्हें भिक्षा नहीं मिली। क्रोध में आकर उन्होंने शाप दे दिया--

मा भूत त्रिपुरुषी विद्या, मा भूत त्रिपुरुषी धनम्।

मा भूत त्रिपुरुषी सख्यम्, व्यासो वाराणसीम् शपेत्।।

(विद्या, धन और सख्य काशी में वास करने वालों की तीन पीढ़ी तक नहीं रहेंगे।) माता अन्नपूर्णा, वेदव्यास के अहंकारपूर्ण शाप से अत्यंत क्रोधित हुईं और उन्हें नगर से बाहर चले जाने की आज्ञा दी। व्यासजी का अहंकार नष्ट हो गया। उनकी दीन प्रार्थना से तुष्ट माता ने उन्हें क्षमा कर दिया और गंगा पार बसने तथा पर्वों के समय काशी नगरी में आने का आदेश सुना दिया। व्यासजी व्यासकाशी में बस गये। कहते हैं, तभी से मुख्य पर्वों पर काशी के कोतवाल कालभैरव के कड़े पहरे में वेदव्यास काशी-परिक्रमा और भगवान विश्वनाथ का दर्शन कर वापस लौट जाते हैं। काशी में उन्हीं भगवान वेदव्यास को समर्पित है आषाढ़ पूर्णिमा। इस दिन पूरी श्रद्धा से बनारस में लोग अपने गुरुओं का पूजन करते हैं।

वैसे तो बनारस में कौन गुरू है और कौन शिष्य कहना कठिन है। वक्ता और श्रोता दोनों एक दूसरे को गुरू कहते मिलेंगे।कहते हैं कि आदि शंकराचार्य जब बाबा विश्वनाथ की गली में पहुँचे तो देखा कि एक सफाईकर्मी झाड़ू लगा रहा है। उन्होंने रास्ते से उसे हटने को कहा तो उसने हँसकर पूछा, किसे हटना को कह रहे हैं स्वामीजी? शरीर को कि आत्मा को?” आदि शंकर हतप्रभ रह गये। काशी ने बहुतों को तत्वज्ञान दिया है।

पान घुलाते सुनत हउआ गुरू, हँ गुरू के सम्बोधन से ही यहाँ हर बात शुरु होती है, गप्प में बदल जाती है। परम्परा के पोषक बनारस में हर सौ-पचास कदम पर गली आधुनिकता की ओर मुड़ती है। गलियों के इस शहर में हर गली की अपनी एक अलग भाषा है। पंडे-दलालों और व्यापारियों की भाषा को समझना तो हर बनारसी के लिये भी संभव नहीं। परन्तु मदमाते सावन की तरह मौजमस्ती की समूचे बनारसियों की एक भाषा है, एक संस्कृति है, एक चाल-ढाल है। गप्प लड़ाना यहां के लोगों की संस्कृति है। यहाँ सावन के मेले में जब एक रेवड़ी बेचने वाला चिल्लाता है कि-ले लो बैजूसाव की गुलाबी रेवड़ी, तो दूसरा कहता है कि यहाँ से ले लो, बैजूसाव के बाप की गुलाबी रेवड़ी। यहाँ एक भंग का गोला छानकर लोग तीनों लोकों की सैर कर जाते हैं। भांग छानने वालों को यहाँ आदर से गहरेबाज कहा जाता है। सावन की फुहार से काशी मदमाती है तो गहरेबाजों की गप्प में नव रस टपकने लगते हैं। मस्ती में आये गहरेबाज कब उड़ा रहे हैं, कब सच बोल रहे हैं—भाँपना अत्यन्त कठिन है।

सत्तीचौतरा मुहल्ले में भद्रकालीजी का मन्दिर है। मन्दिर के सामने बैठने वाला पनवाड़ी प्रतिदिन मन्दिर में रहनेवाले एक विद्यार्थी से कहता था- गुरू,आज माल आ जाई, ध्यान रखिहा, जइसे ही कुआँ में लाइट के सिगनल मिली लपक के बतइहा, डेढ़ करोड़ के माल आवे के सूचना हौ। एक दिन तीन-चार कान्स्टेबलों के साथ राउण्ड पर निकले चौक थाने के नए दारोगा ने सुन लिया। फिर क्या था, पनवाड़ी को खींच लिया, कुएँ का पता पूछा और आनन-फानन में कुएँ में उतरने की तैयारी शुरु कर दी। लोग इकट्ठे होने लगे। तब किसी ने बताया कि पनवाड़ी रोज ऐसे ही उड़ाता रहता है। दारोगा साहब ने पनवाड़ी की पीठ पर अपनी झेंप मिटाई और चल दिये।

बेढब बनारसी की गप्पबाजी ने कइयों को मुश्किल में डाला था। एक बार उन्होंने कह दिया कि, मैं भी हरिऔधजी के गाँव का रहने वाला हूं। मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि प्रियप्रवास हरिऔधजी का लिखा हुआ नहीं है। प्रियप्रवास के वास्तविक रचयिता उनके गुरू बाबा सुमेर सिंह हैं बेढबजी का यह गप्प अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं में छप गया। मजे की बात तो यह है कि दो-तीन समीक्षकों ने बेढबजी के इस मजाक को सच मानकर अपनी पुस्तकों में इसका उल्लेख कर दिया।
एक बार एक संवाददाता बेढबजी से मिलने गए। बेढबजी ने कहा- आज दो साँढ़ लड़ते-लड़ते माधोराज के धरहरा पर चढ़ गए और एक ने दूसरे का पीछा तब तक नहीं छोड़ा, जब तक कि हुरपेंट कर दूसरे को नीचे धकेल नहीं दिया।संवाददाता ने यह समाचार अपने पत्र में छाप दिया। पुलिस के अधिकारी बौखला गए क्योंकि माधोराज का धरहरा संवेदनशील ऐतिहासिक इमारत है और साँढ़ों का नाम दो सम्प्रदायों पर रखा गया था। समाचार निराधार निकला तो संवाददाता को काफी फटकार सुननी पड़ी।

अपनी मस्ती में चूर बनारसियों के लिये सावन मौज का साज है। मानस मन्दिर का श्रावणी मेला हो या बाबा विश्वनाथ की गली के बाहर कचौड़ियों की दुकान—काशी ने कोंहड़े को काशीफलके सम्मान से विभूषित कर दिया है। है कोई ऐसा शहर जो अपने नाम पर एक फल बना सके। सावन के समान ही मस्ती के पर्याय बनारसियों ने जीवन का मर्म पा लिया है। इसे सिद्ध करने के लिये एक ही उदाहरण काफी होगा। चिलचिलाती गर्मी में एक ताँगेवाला आराम फरमा रहा था। एक राहगीर ने उससे दुर्गाकुण्ड चलने को कहा तो उसने मना कर दिया। राहगीर ने उससे परिश्रम करने का उपदेश देना आरम्भ कर दिया। ताँगेवाले ने पूछा कि फायदा क्या होगा। राहगीर ने कहा कि दो पैसे अधिक मिलेंगे तो बड़ी गाड़ी खरीद लोगे और फिर ज्यादा पैसे बना लोगे। ताँगेवाले ने फिर पूछा—फिर? फिर क्या, फिर आराम करना ताँगेवाले ने कहा—जब अन्त में आराम ही करना है तो इतनी मिहनत क्यों। अभी भी आराम ही तो कर रहा हूँ। कहकर फिर सो गया।

ऐसा है बनारस जहाँ मानों हवा में भाँग घुली हो। गंगा यहाँ हमेशा ही उलटी बहती है, फलों का राजा आम जब मस्ती में आता है तो लंगड़ा हो जाता है और बात बतरस में बदलकर साँसों में प्राण फूँक देती है।

चौसठ योगिनियों, बारह सूर्य, छप्पन विनायक, आठ भैरव, नौ दुर्गा, बयालीस शिवलिंग, नौ गौरी, महारूद्र और बारह ज्योर्तिलिंगों वाली काशी में कचौड़ी, रबड़ी, मलाई, लस्सी और पान की दुकानों पर सावन बारहों महीने छाया रहता है। इसीलिये तो कहा जाता है,

चना, चबैना, गंगजल जो पुरवै करतार।

काशी कबहूँ न छोड़िये विश्वनाथ दरबार।।

शील भूषण शर्मा,

F-114A, कटवारिया सराय,

नई दिल्ली-110016,

मो.9810246823

1 comment:

  1. बहुत बढ़िया...चंद शब्दों में बनारस की प्रकृति और दर्शन को समेटने की खूबसूरत कोशिश...या यूं कहें कि आपने तो बनारस का जीवंत दर्शन ही करा दिया...

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