Monday, July 4, 2011

भाविउ मेटि सकहिं त्रिपरारी

भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी

16 जूलाई 2011 को शिवाराधना का बहुप्रतीक्षित विशेष कालखण्ड सावन (श्रावण) का महीना प्रारम्भ हो रहा है। भगवान शंकर ने स्वयं कहा है कि माता पार्वती ने उन्हें पाने के लिये इसी महीने में उग्रतम तप किया था।इसीलिये भगवान को यह माह अत्यन्त प्रिय है। सकाम हो या निष्काम, भगवान शंकर की आराधना में मनसा पूजन और पार्थिव पूजन का विशेष महत्व है। भगवान श्रीरामचन्द्र ने रामेश्वरम्-सेतुबन्ध के पहले बालुका से शिवलिंग का गठन और पूजन करके भगवान् शिव को प्रसन्न किया था। माता पार्वती ने नारद के कहने पर श्रावण मास भर पार्थिव-पूजन करके शिव को प्राप्त कर लिया था। श्रावण में गन्धर्वराज पुष्पदन्त ने पार्थिवेश्वर को प्रसन्न कर खोई हुई प्रतिष्ठा और वैभव दोनों प्राप्त कर लिये थे। श्रावण के महीने में मार्कण्डेय की आराधना से साम्ब सदाशिव का प्रसन्न होना और यमराज की पराजय की कथा सब जानते हैं।

पार्थिवेश्वर सदाशिव भयंकर रोगों और विपदाओं से, शत्रुओं और विवादों से, तमाम कष्टों से तुरन्त मुक्ति दिलाते हैं। आशुतोष हैं, अवढरदानी हैं--- विधि का विधान पलटकर चारों पुरुषार्थ तुरन्त सुलभ करा देते हैं। पार्थिव-विग्रह के पूजन से विवाह संबंधी सारी बाधाएँ निश्चय ही दूर होती हैं।

मानस में नारदजी ने स्पष्ट कहा है---

जौं तपु करै कुमारी तुम्हारी। भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी।।

भगवान् शंकर जन-गण के निर्विवाद देवता हैं। अतः पार्थिव पूजन बिना किसी भेदभाव के सभी कर सकते हैं।बिना किसी दिखावे और खर्च के अत्यन्त आसान किन्तु अत्यन्त फलदायी है श्रावण में भगवान शिव की आराधना।

पूजन सामग्री-

मिट्टी – शमी या पीपल के जड़ की, विमौट(दीमक की मिट्टी), गंगादि पवित्र स्थानों की मिट्टी, किसी पवित्र स्थान पर जमीन के चार अंगुल नीचे की मिट्टी

- फूल, अक्षत, रोली, सिंदूर, मौली, भस्म, पान, सुपारी, लौंग, ईलायची, पंचमेवा, रूद्राक्ष की माला, बत्ती, मिट्टी के दीपक,जनेऊ, अगरबत्ती, बेलपत्र, मिट्टी का कटोरा, माचिस, कपूर, धतुर फल, दूब, कुश, गंगाजल, घी, दूध, दही, शहद, शक्कर, ऋतुफल,कांसे की प्लेट, पूजा की थाली, पूजा के लिये स्वच्छ जल,कांसे का परात,कांसे का कटोरा,पेंदी में बारीक छेद किया हुआ तांबे का लोटा।

कामना पूर्ति के लिये विशेष...... पिसी हल्दी, केसर, इत्र, शक्कर मिश्रित भांग, ईख(गन्ने) का रस, शमी का पत्ता

पूजन-विधि—

- कुशा की पवित्री धारण कर आचमन करें तथा रक्षा दीप जला लें।

- ऊँ ह्राँ पृथिव्यै नमः का जप करते हुए कांसे की प्लेट में आवश्यकतानुसार मिट्टी लेकर पानी का थोड़ा छींटा डालें।

- हाथ में अक्षत-पुष्प लेकर गणपति के साथ माता गौरी का स्मरण करें और सादर पुष्प-अक्षत परात में डाल दें। परात के बीच में कांसे का औंधा कटोरा रख दें।

- दाहिने हाथ में अर्घ्य पात्र [मिट्टी का कटोरा] लेकर उसमें तीन कुश, सुपारी, पुष्प, अक्षत, जल और द्रव्य रखकर इच्छा का संकल्प करें और वहीं सामने रख दें।

- ऊँ नमः शिवाय-- इस मंत्र का लगातार जप करते हुए मिट्टी से शिवलिंग गढ़ें। शिवलिंग अंगूठे से बड़ा न हो।

- कांसे के औंधे कटोरे पर बेलपत्र रखकर उसपर शिवलिंग रखें। शिवलिंग पर मिट्टी की छोटी गोली रखें। उस लिंग के चारों ओर दस लिंग रखें।

- ग्यारह लिंगों को पान के पत्ते अथवा बेलपत्र से ढक दें जिससे पानी आदि से लिंग की मिट्टी न बहे।

- फिर मंत्र ऊँ नमो भगवते साम्बसदाशिव पार्थिवेश्वराय नमः का जप करते हुए माता पार्वती के साथ भगवान् शंकर के आवाह्न, प्राणप्रतिष्ठा और आसन के लिये शिवलिंग पर फूल-अक्षत अर्पित करें।

फिर अर्घ्य,पाद्य, आचमन और स्नान के लिये जल अर्पित करें। फिर पंचामृतस्नान, शुद्ध स्नान और आचमन निवेदित करें।

अभिषेक-विधि.....अपनी कामना के अनुसार भगवान का अभिषेक करें।

(1)विवाह के लिये--- छिद्रदार लोटे में केसर मिश्रित दूध से भगवान् का निम्न मन्त्र से अभिषेक करें।

ऊँ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च।

नमः शंकराय च मयस्कराय च।

नमः शिवाय च शिवतराय च।। (51 मन्त्र)

(2)आजीविका प्राप्ति और सर्वविध कल्याण के लिये-----छिद्रदार लोटे में गन्ने का रस भरकर निम्न मन्त्र से भगवान् का अभिषेक करें।

नमो नेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमः,

नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः।

नमो वर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमः,

नमः सर्वस्मै ते तदिदमिति शर्वाय च नमः।।(21 मन्त्र)

(3)रोग नाश और संकटों से मुक्ति के लिये---- छिद्रदार लोटे में कुशा और गंगाजल भरकर निम्न मन्त्र से भगवान् का अभिषेक करें।

मृत्युञ्जयाय रुद्राय नीलकण्ठाय शम्भवे।

अमृतेशाय शर्वाय महादेवाय ते नमः।।

फिर ऊँ नमो भगवते सांबसदाशिव पार्थिवेश्वराय नमः का जप करते हुए शुद्ध स्नान, आचमन, वस्त्र, जनेऊ, आचमन, चंदन, भस्म, अक्षत और पुष्प अर्पित करें।

फिर बेलपत्र पर चन्दन से राम-राम लिखकर भगवान् को अर्पित करें।भगवान शंकर को बेलपत्र का अर्पण तीन जन्मों का पाप नष्ट कर देता है।

त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रिधायुतं।

त्रिजन्म पाप संहारं बिल्वपत्रं शिवार्पणम्।


फिर ऊँ नमो भगवते सांबसदाशिव पार्थिवेश्वराय नमः का जप करते हुए दूब, धूप, दीप, नैवेद्य [पञ्चमेवा], आचमन, ऋतुफल, धतूर फल और लौंग-सुपारी युक्त पान और दक्षिणा अर्पित करें।

तदुपरान्त भगवान को कामना-द्रव्य अर्पित करें---

(1) भगवान को विवाह की इच्छा बताते हुए ऊँ नमो भगवते सांबसदाशिव पार्थिवेश्वराय नमः बोलकर पिसी हल्दी अर्पित करें।

(2) भगवान को रोग और संकटनाश की इच्छा बताते हुए ऊँ जूँ सः माम् पालय पालय बोलकर इत्र या शमी का पत्ता अर्पित करें।

(3) भगवान को अपनी आजीविका और सर्वविध कल्याण की इच्छा बताते हुए ऊँ ह्रौं जूँ सः माम् जीवय जीवय पालय पालय सः जूँ ह्रौं ऊँ बोलकर शक्कर मिश्रित भांग अर्पित करें।


इसके बाद पूर्व, ईशान, उत्तर आदि क्रम से पीठिका पर आठ दिशाओं में भगवान को फूल-अक्षत निवेदित करें।

कामना-मन्त्र जप— इसप्रकार पूजन के रुद्राक्ष की माला पर कामना के अनुसार एक माला निम्न मन्त्र का जपें तथा भगवान् को अर्पित करें---

(1)विवाह के लिये----- ऊँ नमो भगवते रुद्राय

(2)आजीविका प्राप्ति और सर्वविध कल्याण के लिये----ऊँ तत्पुरुषाय विद्महे, महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्

(3)रोग मुक्ति और संकटनाश के लिये... ऊँ ह्रौं ऊँ जूँ सः भूर्भुवःस्वः त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिम् पुष्टिवर्धनम्, उर्व्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीयमामृतात् भूर्भुवःस्वरों जूँ सः ह्रौं ऊँ

- आरती करें, क्षमा प्रार्थना और कार्य सिद्धि की प्रार्थना करते हुए पुष्पांजली दें।

- आधी प्रदक्षिणा करें और फिर आने का आग्रह करते हुए विसर्जित करें।

- विसर्जन के लिये ऊँ शान्तिः ऊँ शान्तिः ऊँ शान्तिः कहते हुये परात हिला दें और सावधानी से पूजन-सामग्री सहित शिवलिंग उठाकर किसी नदी, तालाब अथवा पीपल के पेड़ के नीचे रख दें।


शिव पूजन में विशेष ---

- जिनका यज्ञोपवीत न हुआ हो, वे प्रणव (ऊँ) रहित मन्त्रों का उच्चारण करें।

- पूजन के प्रारम्भ में माथे पर भस्म या मिट्टी का तिलक अवश्य लगायें

विना भस्मत्रिपुण्ड्रेण विना रुद्राक्षमालया।

पूजितः अपि महादेवो न स्यात् फलप्रदः।।

- भगवान शंकर पर फूल चढ़ाने का बहुत महत्व है।भगवान शंकर को सर्वाधिक प्रिय फूलों में आक, गूमा फूल, कुश का फूल, धत्तुरे का फूल और नीलकमल तथा पत्तों में बेलपत्र और शमी पत्र हैं।

वीरमित्रोदय के अनुसार


तपःशीलगुणोपेते विप्रे वेदस्य पारगे।

दत्त्वा सुवर्णस्य शतं तत्फलं कुसुमस्य च।।

(भगवान शंकर को फूल अर्पित करने का

वही फल है जो तपःशील, सर्वगुणसम्पन्न, वेद में निष्णात किसी ब्राह्मण को सौ सुवर्ण दान का) लेकिन केतकी, केवड़ा, अनार, जूही, दोपहरिया, सेमल के फूल भगवान शंकर की पूजा में निषिद्ध हैं।


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